साहित्य

अपनी-अपनी खुशी

जयचन्द प्रजापति 'जय'

बीच बाज़ार में
कुछ बच्चे गुब्बारे बेंच रहे थे

कुछ धनाढ्य बच्चे
गुब्बारे खरीद रहे थे

बेचने खरीदने वाले
दोनों बच्चे थे

दोनों खुश नजर आ रहे थे
अपनी-अपनी खुशी है

एक गुब्बारा खरीदकर खुश है
एक गुब्बारा बेचकर खुश है
….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

कविता का भावार्थ—–

जयचन्द प्रजापति ‘जय’ की कविता “अपनी-अपनी खुशी” बाजार की उस साधारण दृश्य को चित्रित करती है जहाँ कुछ बच्चे गुब्बारे बेच रहे हैं और कुछ धनी बच्चे उन्हें खरीद रहे हैं। बेचने वाले और खरीदने वाले दोनों ही बच्चे हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएँ अलग-अलग हैं—एक गरीबी में जीविका चलाने को बेचकर संतुष्टि पाता है, तो दूसरा सुख-सुविधा में खरीदकर आनंदित होता है।

कवि सूक्ष्मता से बताते हैं कि सुख की परिभाषा व्यक्तिगत होती है; दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति में प्रसन्न नजर आते हैं—एक गुब्बारा बेचकर कमाई की खुशी में, दूसरा उसे खरीदकर खेलने की प्रसन्नता में। यह कविता जीवन की विविधता और परिस्थितिजन्य सुख की फिलॉसफी को दर्शाती है, जहाँ खुशी बाहरी समानता पर निर्भर नहीं, बल्कि आंतरिक स्वीकृति पर टिकी रहती है।

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