
मैं पीपल का पत्ता हूँ, जड़ों से जुड़ जाता हूँ,
संस्कारों की छाया में हरदम मुस्काता हूँ।
माँ की ममता की धारा से जीवन महकाता हूँ,
पिता हिमालय-से साहस पाकर आगे बढ़ जाता हूँ।
भाई बन ढाल खड़ा हो तो बल भी भर जाता हूँ,
बहना की चाँदनी पाकर दुःख सब भूल जाता हूँ।
जब जग की रीति से डरकर भीतर काँप जाता हूँ,
श्याम-मुरली की तान सुनूँ तो फिर सँभल जाता हूँ।
क्षणभंगुर हूँ, झरकर भी हरियाली दे जाता हूँ,
मिट्टी की गोद में गिरकर वचन निभा जाता हूँ।
नाम नहीं केवल तन का, कर्मों से पहचान पाता हूँ,
“दिव्य” बन प्रेम-दीप जलाकर, जग को राह दिखाता हूँ। 🌿
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




