
जब बसंत पहाड़ियों पर धीरे से झुकता है,
भगोरिया मिट्टी से रंग बनकर उठता है।
पेड़ों से पहले गलियाँ खिल उठती हैं,
लाल, हल्दी सा पीला, पत्तों सा हरा, आकाश सा नीला,
सब लोग झूमते हैं, गाते हैं,
जैसे खुलकर हँसी बिखर गई हो।
चाँदी के हार धूप में दमकते हैं,
चूड़ियाँ हर कदम पर गुनगुनाती हैं,
पायल धूल से कहती है —
“यही हमारी मिट्टी है, यही हमारा अभिमान है।”
भुने चनों की खुशबू हवा में घुलती है,
महुआ की मिठास मन में उतरती है,
मिट्टी के चूल्हों से उठती मसालों की महक
आशीर्वाद-सी लगती है।
जब ढोल और मांदल बजते हैं,
धरती भी नाच उठती है,
पाँव लय में थिरकते हैं,
और मन उमंग से भर उठता है।
भगोरिया केवल एक मेला नहीं,
यह हमारी संस्कृति की धड़कन है,
हमारी पहचान की रोशनी है,
हमारे पूर्वजों की विरासत है।
चलो फिर रंगों में भीग जाएँ,
ढोल की थाप पर मुस्काएँ,
हाथों में खुशियों की थाली लेकर
सबको प्रेम से बुलाएँ —
आओ चलें, भगोरिया मनाएँ,
भजिया, नुकती, सेव खिलाएँ।
हँसी के संग गीत सजाएँ,
आओ चलें, भगोरिया मनाएँ,
आओ चलें, भगोरिया मनाएँ 🌾✨
रंजीता निनामा, झाबुआ (म.प्र.)




