
आषाढ़ की पहली बरसात संग,
गूँज उठी शंख की धुन।
पुरी की गलियाँ सज गईं,
जयकारों से भर गया चुन।
तीन रथ खड़े द्वार पर,
ऊँचे-ऊँचे रंग-बिरंगे।
बलभद्र, सुभद्रा संग कन्हैया,
भक्तों के मन में उमंग घने।
खींच रहे रस्सी नर-नारी,
छोटा-बड़ा कोई नहीं।
एक ही नारा गूँजे “जय जगन्नाथ”,
भेद-भाव यहाँ कोई नहीं।
रथ का पहिया जब चलता है,
मानो धर्म स्वयं बढ़ता है।
राजा भी झाड़ू लगाए,
सेवा में सब झुक जाता है।
गुंडिचा मंदिर की ओर चले,
मौसी के घर मेहमान बन।
नौ दिन का ये पावन मेला,
प्रेम और भक्ति का ज्ञान बन।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




