साहित्य

ग़ज़ल

वाई. वेद प्रकाश

भटकती ज़िन्दगी से वास्ता था
मेरा भी तिश्नगी से वास्ता था।
फ़कत चेहरे मुझे लगते सियासी,
उन्हें बस बंदगी से वास्ता था।
लहर आई बहाकर ले गयी सब,
मौज -ए- दरिया से उसका वास्ता था।
महज़ आलोक में दिखता दिया है,
कि उसका रोशनी से वास्ता था।
वह अक्सर चाहता है एक मौसम,
लुटे सबके ज़िया से वास्ता था।
वह हो सिरमौर दुनिया में अकेला,
बस उसका ज़िन्दगी से वास्ता था।
जो आंसू बहा आकर के टपका,
फ़कत आंखों से उसका वास्ता था।

वाई. वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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