
लज्जा नारी का आभूषण थी,जिसे घूंघट में वह रखती,
देहरी द्वार की लक्ष्मण रेखा,पार नहीं कर सकतीं,,
इज्जत घर की,नारी से,रखरखाव देख अनुमान करें,
अमुक कुलों की श्रेष्ठ नारियां,निगाह जमीं पर रखतीं।।
शिक्षा और संस्कार दोनों में, समन्वय बहुत बनाया जाता,
शिक्षा का पाश्चात्य खुलापन, एक हद तक स्वीकारा जाता,
मेरी खुद की मामी को देखा, उसी रूप में था मैंने
थीं काशी विद्यापीठ में प्रोफेसर,
संस्कार जुदा न हो पाता।।
सिर पर पल्लू,विनयावत लुक सरल निगाह पैर तक साड़ी,
आदर देने में चूक न करतीं, करतीं प्रणाम रोक कर गाड़ी,
कहां दिखें सुसंस्कार आज वो,पल्लू हास्य परिहास लगे,
यह पल्लू थी अनमोल गुफा,जहं अस्मत नारी की लगती प्यारी।।
अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश



