
कभी-कभी मैं सोचती हूं,
नारी जीवन का क्या अर्थ है?
दूसरों पर हर पल निर्भर रहे,
क्या उसका जीवन व्यर्थ है?
कब तक दूसरों की खातिर,
अपने सपनों की बलि देती रहेगी।
आंखों से अश्रु बहते रहेंगे,
हर गम क्यों वह चुपचाप सहेगी।
नारी अब अपनी शक्ति पहचाने,
अपने ख्वाबों को दे उड़ान।
अपनी मर्जी से जीवन जी कर,
अपने व्यक्तित्व की बढ़ायें शान।
प्यार समर्पण और घर की देखभाल,
सारे कर्तव्यों को प्यार से निभाती रहे।
दूसरों के साथ खुद को खुश रखे,
अपने आत्मसम्मान को सजाती रहे।
नारी जीवन का अर्थ क्या है सच में,
अब हर नारी को समझना होगा।
कर्तव्य के साथ अपने अधिकार को,
पूरे हक़ से समाज से मांगना होगा।
सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र।




