
गरजा रण-भू पर घनघोर प्रलय-सा, सिंहनाद प्रखर जब छाया,
काँपा था क्रूर फिरंगी-सिंहासन, ध्वज-दम्भ धरा पर आया।
वज्र-व्रत बांध ललाट ज्वाला, दृग विद्युत-रेखा-सी काया,
“जीवित न धरा जाऊँगा मैं!”— दृढ़ घोष गगन में गाया।
भाल भास्कर-सा दहका, रग-रग में रण-राग समाया,
स्वाधीन स्वप्न सुवासित बन,नव-युग का दीप जलाया।
अंतिम अंगार स्वयं पर धर, हंस मृत्यु-वरण कर पाया,
भारत-भू का अमर सपूत वह “आजाद” अमर कहलाया।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




