
दिलो-दिमाग में बस एक ही आस है,
लगी तो मुझे बस तेरे दर की प्यास है।
उर में लगी मुझ विरहन के आग है,
भक्ति सागर मेें डूबी मिलन-
रास है।
दुनिया जहान में रमता नहीं है चित्त मेरा,
यह तो ढूँढता है बस तेरा खुला कपाट है।
कब आओगे आराध्य मेरे! तुझमें ही तो अंतिम वास है।
मेरे दिल की प्यास बुझा दो मेरी बस यही अरदास है।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक भाव, सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।




