साहित्य

इतनी सी है चाह मेरी

रिया राणावत

अब जीना चाहती हूँ
उड़ना चाहती हूँ
आगे बढ़ सबको दिखाना चाहती हूँ
की लड़की हूँ, पर कमज़ोर नहीं…
की बेटी हूँ, पर पराई नहीं…
अपने सपनों की उड़ान से
पूरी कायनात को अपना बनाना चाहती हूँ
अपनी उड़ानों से सबका अच्छा करना चाहती हूँ
बेटी बनकर पिता का नाम आगे बढ़ाना चाहती हूँ
समाज में खुद की एक पहचान बनाना चाहती हूँ
ये मुमकिन बनाकर गर्व से सिर उठा कर जीना चाहती हूँ
बोझ नहीं बनना मुझे किसी पर
खुद की कमाई से, अपने सपनों की उड़ान उड़ना चाहती हूँ…
अपने परिवार का ही नहीं, देश का नाम आगे बढ़ाना चाहती हूँ
मैं देश की बेटी हूँ, देश का अभिमान बनना चाहती हूँ……

— रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ ( मध्य प्रदेश)

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