साहित्य

सागर का दर्द

डॉ रमेश कटारिया पारस

सागर का दर्द

हे मनुष्य तुम कर रहे हो सदियों से मेरा दोहन
ले जाते हो सीपी शंख मोती मूंगा और माडिक
तरह तरह की जड़ी बूटियाँ सजाते हो खुद को और अपने ड्राइंग रूम को

बदले में क्या देते हो मुझे
अपने द्वारा पैदा की हुई गंदगी
दूषित करते हो मेरे घाटों को पिकनिक मनाने के बहाने से चलाते हो बड़ी बड़ी नावें और जहाज़ चीरते हो मेरा सीना

तुम्हारे लिए होती है वे केवल प्रतियोगिताएं केवल मनोरँजन
ले जाते हो भर भर कर मछलियाँ
जो है मेरी संतान की तरह
और खा जाते हो उन्हे तुम या कर देते हो कैद अपने घर केड्रांईग रूम के एक्वेरियम में
उन आज़ाद प्राणियों को जो त्याग देती है अपना जीवन अलग होते ही मुझसे

तुम क्या समझोगे मेरे दर्द को हे निर्दयी इंसान
मुझे तो रोज़ ही झेलना पड़ता है दर्द तुम्हारी सुनामी लहरों का

तुम तो एक बार में ही घबरा गए मेरी सुनामी लहरों से

सागर से शिकायत

हे सागर तुमने क्यों छॊडी तुमने अपनी मर्यादा

और बहा दीअपनी सुनामी लहरें
जिसके कारण हो रही है तुम्हारी बदनामी
क्या क़सूर था ऊन निरीह मछुआरों का
जो पाल रहे थे अपने बच्चों को तुम्हारी कृपा से
और काट रहे थे अपना संघर्ष भरा जीवन
वे सैलानी जो आए थे दूर दूर से देखने तुम्हारा सौंदर्य

उन्हे क्या पता था छिपा हुआ है उस सौंदर्य के पीछे तुम्हारा विकराल रौद्र रूप
सुनामी के आवरण में
हे सागर तुमने अपनी मर्यादा त्याग कर
तोड़ा है विश्वास उन सभी लोगो का जो सोचते थे

सागर कभी नहीँ तोड़ता अपनी मर्यादा

ग़ज़ल

अब कोई जुगनू चमकता क्यू नहीँ
दिल किसी सेहरा में लगता क्यू नहीँ

बादलों के बीच से सूरज निकलता क्यू नहीँ
हर तरफ़ ग़म के अँधेरों को निगलता क्यू नहीँ

है यदि ईमानदारी तेरी कोशिश में अगर
जैसा तूने सोचा है वैसा ही होगा क्यू नहीँ

हमने दिल की आह से पर्वत पिघलते देखे है
दिल से तेरे अश्क का झरना निकलता क्यू नहीँ

गर्दिशो में है सितारा तुम बताओ क्या करे
बादलों की आड़ से चंदा निकलता क्यू नहीँ

रात ग़म की ढल गई अब सुबह होने को है
आखिर तुम्हारे जुल्म का सूर्य ढलता क्यू नहीँ

दर्द पर्वत सा खड़ा है पारस तेरे सामने
आँख से आँसू का कतरा भी गिरता
क्यू नहीँ

डॉ रमेश कटारिया पारस

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