साहित्य

नारी

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

नारी ही नारायणी, भिन्न-भिन्न हैं रूप।
सुता बहन पत्नी बनी,माँ का रूप अनूप।।
मांँ का रूप अनूप,निभाती जिम्मेदारी।
करती सम व्यवहार,लुटाती ममता सारी।।
गीता जोड़े हाथ, धरा पर महिमा न्यारी।
मांँ के जैसा त्याग,कौन करती है नारी।।

नारी से ही सृष्टि है,सुखमय करती धाम।
चाहे जितना कष्ट हो,करे नहीं आराम।।
करे नहीं आराम,ध्यान सबका ही देती।
सदा रहे श्रम साध्य,सभी विपदा हर लेती।।
गीता रखती मान,शत्रु पर पड़ती भारी।
सैनिक का शुचि वेश,धरे जग में है नारी।।

देती खुशियांँ जो हमें, जिससे यह संसार।
प्यारी रचना ब्रह्म की,बनीं सृष्टि आधार।।
बनी सृष्टि आधार,करो मत इसका शोषण।
नारी रूप अनूप,सभी का करती पोषण।।
गीता दे उपहार,नहीं वापस कुछ लेती।
सहकर कष्ट अनेक, जन्म मानव को देती।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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