न्यायशास्त्र,न्यायविद्या,न्यायसूत्र, न्यायदर्शन,तर्कविद्या,आन्वीक्षिकी का अध्ययन-अध्यापन अति आवश्यक
डॉ. शीलक राम आचार्य

दर्शनशास्त्र और फिलासफी के क्षेत्र में अक्सर यह कहा जाता है कि संसार की कोई भी समस्या ऐसी नहीं है कि जिसका सत्य दर्शन ‘न्यायशास्त्र’ की सहायता से न हो सकता हो। यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिये यह शास्त्र अति उपयोगी है। इसके लिये महर्षि गौतम ने सोलह पदार्थ माने हैं।महर्षि गौतम रचित इस न्यायशास्त्र/न्यायसूत्र ( 5500 वर्ष पूर्व) में पांच अध्याय और 538, सूत्र हैं। भारतीय दर्शनशास्त्र में न्यायसूत्र को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।इसे हेतुविद्या,वादविद्या,आन्वीक्षिकी,तर्कविद्या,
ज्ञानविद्या,प्रमाणविद्या आदि भी कहा जाता है। हजारों वर्षों से वेदों और वैदिक साहित्य के रक्षार्थ न्यायशास्त्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।सत्य की रक्षा, स्वमत स्थापन और विरोधी मतों को पराजित करने के लिये न्यायशास्त्र सनातनियों के लिये ही नहीं अपितु सभी सत्य प्रेमियों के लिये किसी ब्रह्मास्त्र या आधुनिक भाषा में हाइड्रोजन और परमाणु बम से कम नहीं है।इसको भलि तरह से समझने के लिये पाश्चात्य विचारकों और उनके अंधभक्त भारतीयों की पुस्तकें पढ़ने की बजाय पंडित आर्यमुनि,आचार्य उदयवीर शास्त्री, दर्शनानंद सरस्वती, गुरुदत्त आदि द्वारा की की गई व्याख्याएं पढनी चाहियें। पाश्चात्य लेखकों द्वारा भारतीय दर्शनशास्त्र की विभिन्न शाखाओं के प्रति अनेक प्रकार के भ्रम फैला रखे हैं। उनकी संकीर्णता, उनके पूर्वाग्रह और कपोल-कल्पित लेखन भारतीय शिक्षा संस्थानों में अपने पैठ बनाये बैठे हैं।एक बहुत बड़ा भ्रम षड्दर्शनशास्त्र के काल के संबंध में भी है। पाश्चात्य लेखकों ने जानबूझकर वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता तथा भारतीय दर्शनशास्त्र के इतिहास को युनानी इतिहास से नया सिद्ध करने के लिये इसे सिद्धार्थ गौतम के बाद का सिद्ध किये जाने पर जोर लगाये रखा है।इन अंग्रेजी पढ़े लिखे मूर्खों को क्या यह मालूम नहीं है कि सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किसका किया था? सिद्धार्थ गौतम ने जिन शास्त्रों, मान्यताओं, विचारधाराओं, पूजा-पाठ आदि का खंडन किया था, उन सबका अस्तित्व तो सिद्धार्थ गौतम से पहले होना ही चाहिये।या कि सिद्धार्थ गौतम ने हवा- हवाई बातें की हैं? षड्दर्शनशास्त्र का अस्तित्व तो सिद्धार्थ गौतम से कयी सदी पहले भी मौजूद था।इसका निर्माण और लेखन आदि बौद्ध मत के विचारकों से आर्य वैदिक धर्म, संस्कृति और दर्शनशास्त्र की रक्षा के लिये नहीं अपितु वेद मत को प्रस्तुत करने के लिये किया गया था। भारतीय कालगणना में इसी प्रकार का घालमेल करने वाले पाश्चात्य विचारकों के मार्गदर्शक विलियम जोन्स रहे हैं। इनके संबंध में दर्शन व्याख्याकार गुरुदत्त कहते हैं कि ईसा के सम्वत् को भारतीय घटनाओं से जोड़ने वाला एकमात्र वक्तव्य ‘एशियाटिक रायल सोसाइटी’कलकत्ता के सैक्रेटरी विलियम जोन्स का वक्तव्य है। उन्होंने 28 फरवरी सन् 1793 में सोसायटी की एक मीटिंग में कहा था कि इतिहास उना विषय नहीं,इस पर भी उनको एक बात सूझी है।वह यह कि मैगास्थनीज ने एक स्थान पर लिखा है कि वह एक तेजस्वी राजा सैंड्राकोटस के दरबार में रहा है।वह राजा पोलिब्राथ में शासन करता था।सैंड्राकोटस पोलिब्रोथ का राजा था।जोंस महाशय को यह समझ आया कि पोलिब्रोथ पाटलिपुत्र और सैंड्राकोटस है चंद्रगुप्त।बस,इस इतिहास से अनभिज्ञ व्यक्ति के कथन पर सब अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग बोल उठे कि भारतीय घटनाओं के तिथि काल का ईसा सम्वत् से संबंध जुड गया।….जो बात एक गोरी चमड़ी वाला कह दे,वह सदा सत्य ही मानी जानी चाहिये,ऐसी परंपरा भारत में चल रही है…..मैगस्थनीज के विषय में अपने धर्मशास्त्रों का इतिहास ग्रंथ में काणे लिखते हैं कि मैगस्थनीज एक महाझूठा व्यक्ति था…. यदि वह भारत में आया था ,तो उसने विष्णु गुप्त चाणक्य के संबंध में भी विवरण देना चाहिये था, लेकिन ऐसा कोई विवरण उसने नहीं दिया है।सच तो यह है कि विष्णु गुप्त का काल 1600 ईसापूर्व का है। महर्षि वात्स्यायन और महर्षि गौतम का काल तो उनसे बहुत पहले का है। लेकिन पाश्चात्य लेखकों की अंधी नकल ने भारतीय लेखकों का माईंड वाश किया हुआ है।
न्याय का अर्थ है ‘प्रतिष्ठित युक्ति’। प्रतिष्ठित युक्ति उसे कहा जाता है जो किसी प्रत्यक्ष में जाने हुये का परिणाम हो। धुआं देखकर आग, घटाएं देखकर वर्षा तथा कमजोरी देखकर कुपोषण आदि का ज्ञान इसी श्रेणी में आता है।प्रत्यक्ष के आधार पर अप्रत्यक्ष का ज्ञान। धुआं प्रत्यक्ष है और अग्नि परोक्ष है। इससे भी परोक्ष अग्नि का ज्ञान हो जाता है।इस तरह से तर्क या युक्ति करना ‘न्याय’ कहलाता है। इसके लिये महर्षि गौतम ने अपने न्यायसूत्र/न्यायशास्त्र के पहले अध्याय के पहले ही सूत्र में कहा है – ‘प्रमाण, प्रमेय,संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयय, तर्क,निर्णय,वाद ,जल्प,वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति,निग्रहस्थानानाम्,तत्वज्ञानात्,नि:श्रेयसाधिगम्’। अर्थात् इन सोलह के ज्ञान से नि:श्रेयस की प्राप्ति हो जायेगी।
गुरुदत्त के अनुसार इस सूत्र का सही अर्थ यह है कि इन सोलह पदार्थों के द्वारा प्राप्त संसार के तत्वज्ञान से नि:श्रेयस की प्राप्ति हो जायेगी। पहले इनके द्वारा संसार का सत्य ज्ञान प्राप्त करो और फिर उस ज्ञान से नि:श्रेयस उपलब्ध होगा, सीधे ही नहीं। प्रमाण,प्रमेय आदि सोलह पदार्थों का ज्ञान नि:श्रेयस नहीं दिलवायेगा अपितु इनसे तो संसार का यथार्थ ज्ञान मिलता है। यहां पर नि:श्रेयस का अर्थ विशेष प्रकार का कल्याण है। उपरोक्त सोलह पदार्थों से किसी वस्तु, व्यक्ति, स्थान, घटना, परिस्थिति, सिद्धांत, समस्या आदि की छानबीन करके यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जाता है।यह छानबीन ही तत्वज्ञान प्राप्त करने में सहयोगी बन सकेगी। प्रमाण, प्रमेय आदि को जानना मात्र विद्या और अविद्या को जानना नहीं अपितु विद्या और अविद्या को जानने के साधनों के विषय में जानना है। ये उपरोक्त सोलह साधन हैं पदार्थों का तत्वज्ञान प्राप्त करने के लिये। ‘पदार्थ’ का अर्थ है किसी शब्द का अर्थ। शब्द किसी व्यक्ति, वस्तु,स्थान, घटना, परिस्थिति, तत्व,विचार, समस्या,सिद्धांत आदि को प्रकट करने के लिये प्रयोग किया जाता है। इनमें से किसी के भी यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करने के लिये महर्षि गौतम ने सोलह साधन बतलाये हैं।इनकी सहायता से कोई व्यक्ति संसार के किसी भी पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।’नि:श्रेयस’ यानी शुभ, समृद्धि आदि लानेवाले को कहते हैं। सर्वाधिक भला करने वाला और सर्वाधिक सफलता दिलवाने वाला। उपरोक्त सोलह स्थान मोक्षादि दिलवाने वाले नहीं अपितु अंत में निग्रहस्थान यानी पराजय से मुक्ति दिलवाने वाले होते हैं। निग्रहस्थान यानी तर्क में वह स्थल जहां पर विरोधी असंगत स्थिति में उलझ जाये, जहां पर विरोधी निरुत्तर हो जाये, उससे कोई उत्तर दिये न बने। प्रमाण से लेकर निग्रहस्थान तक के सोलह पदार्थों का अर्थ हुआ कि वह स्थिति जहां किसी समस्या अथवा पदार्थ का सर्वथा निश्चयात्मक ज्ञान प्राप्त हो जाये। न्यायसूत्र के व्याख्याकार गुरुदत्त के अनुसार इन सोलह साधनों का प्रयोग करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ स्थिति में पहुंच जायेगा, इससे उसका कल्याण होने की संभावना बढ जायेगी। सभी संसारियों को इन सोलह पदार्थों का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये।केवल इन सोलह पदार्थों को जानने से कुछ नहीं मिलेगा अपितु इनके द्वारा संसार के विभिन्न पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। तभी न्यायसूत्र/ न्यायशास्त्र का लक्ष्य पूरा हो पायेगा। इन सोलह पदार्थों का ज्ञान जितना सांसारिक कार्यों के लिये उपयोगी है उतना ही उपयोगी प्राकृतिक घटनाओं को जानने में भी है।इस तरह से संसार की समस्यायों का ज्ञान प्राप्त करने से उन समस्याओं से पार जाने में मदद मिलेगी।एक संभावना बन जाती है मोक्ष प्राप्ति की।
बौद्ध मत के ग्रंथ ‘दीघनिकाय’ के अंतर्गत ‘ब्रह्मजालसुत्त’ में सिद्धार्थ गौतम के मुख से 62 प्रकार के मतों की व्यर्थता को कहलवाया गया है।’सुत्त’ शब्द ‘सूत्र’ का अपभ्रंश है।इस सुत्त के अंत में एक पाखंडी गप्प को हांका गया है कि सिद्धार्थ द्वारा भिक्षुओं को ब्रह्मजालसुत्त का यह उपदेश दिये जाने पर दस हजार लोक कंपायमान हो उठे।यह क्या बचपना है? इस सुत्त में वास्तव में जिन बासठ मतों विवरण दिया गया है,वह सिद्धार्थ के देहावसान के कयी सदी पश्चात् का विवरण है। सिद्धार्थ इस प्रकार के दार्शनिक पचड़ों में पड़ते ही नहीं थे। उनकी रुचि किसी प्रकार के दर्शनशास्त्र में नहीं थी।यह बासठ मतों से बचने का उपदेश सिद्धार्थ का नहीं होकर उनके अनुयायियों द्वारा लिखित है। सिद्धार्थ के नाम पर इस प्रकार के अनेक उपदेश तब जोडे गये थे,जब त्रिपिटक साहित्य को लिपिबद्ध करने के प्रयास होने शुरू हुये।यह काल सिद्धार्थ के देहावसान से बहुत बाद का है।इस संबंध में यह ध्यान में रखने योग्य है कि इससे भी अधिक वैचारिक विषम परिस्थिति महाभारत युद्ध से पहले यानी आज से 5500 वर्षो पहले भी उत्पन्न हुई थीं। जनमानस को वैदिक सिद्धांतों से भलि तरह से अवगत करवाने हेतु ठीक उसी समय पर षड्दर्शनशास्त्र का निर्माण हुआ था।कयी सदियों तक सूत्ररूप से यह परंपरा मौखिक रूप से चलती रही। जिस काल में चार्वाक, आजीवक,महावीर,सिद्धार्थ,अजित केशकंबल,प्रकुध कात्यायन,संजय वेलट्टिपुत्त जैसे विचारकों द्वारा सनातन धर्म और दर्शनशास्त्र के विरोध में अपने अपने मतों को सही सिद्ध करने की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई,तब इस षड्दर्शनशास्त्र को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता महसूस हुई। क्योंकि इन उपरोक्त विचारकों ने सनातनी विद्वानों से विभिन्न उपदेश में हार- थककर षड्दर्शनशास्त्र में मिलावट करना शुरू कर दिया था। बौद्ध सम्राटों से इस प्रकार के अनैतिक कुकृत्यों को प्रोत्साहन मिल रहा था। राजसत्ता, धनसत्ता और मजहब सत्ता के नशे में कोई कुछ भी करने में समर्थ हो सकता है। जेम्स मिल, विलियम जोन्स, मैकाले, मार्क्स, मैक्समूलर,गार्बे,डायसन,फर्क्यूहर,
राथ,विल्सन,बासम,ब्लूमफील्ड, कोलब्रुक, व्हिटनी, ग्रिफिथ, लुडविग,गैल्डनर, मैक्डोनल,ओल्डनबर्ग , ब्लूमफील्ड आदि सैकड़ों भाड़े के लेखकों और विचारकों ने लगभग 150 वर्षों तक षड्दर्शनशास्त्र सहित समस्त भारतीय सनातन साहित्य के संबंध में अनर्गल प्रलाप किया है। सनातन धर्म और संस्कृति को बदनाम करने के लिये यह उनके पारसिक अब्राहमिक मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।उन द्वारा किये गये प्रलाप का प्रभाव आज भी भारतीय शिक्षा संस्थानों पर मौजूद है।
महर्षि गौतम ने अपने ‘न्यायसूत्र’ में जिन सोलह पदार्थों का विवरण दिया है उनमें ‘प्रमाण’ यानी किसी प्रामाणिक व्यक्ति का कथन।’प्रमेय’ यानी वह वस्तु, विषय या समस्या, जिसके विषय में प्रमाण एकत्र किये जा रहे हैं।’संशय’ यानी खोज का प्रारंभिक बिंदु। ‘प्रयोजन’ यानी उद्देश्य। ‘दृष्टांत’ यानी जिससे किसी किसी वस्तु विचार अथवा सिद्धांत की समानता प्रकट की जा सके। ‘सिद्धांत’ यानी सिद्ध बात।’अवयव’ यानी अंग प्रत्यंग।’तर्क’ यानी युक्ति।’निर्णय’ यानी तर्क के पश्चात् प्राप्त सत्य ज्ञान।’वाद’ यानी उत्तर प्रत्युत्तर।’जल्प’ यानी वाद के नियमों का पालन नहीं करना। ‘वितंडा’ यानी केवल परमत खंडन। ‘हेत्वाभास’ यानी हेतु का आभास।’छल’ यानी जो नहीं कहा गया उसको कहा गया कथन करना। ‘जाति’ यानी युक्ति को असिद्ध करने के लिये प्रयुक्त वाक्य।’निग्रहस्थान’ यानी पराजय का स्थान।
इन सोलह पदार्थों की सहायता से प्राप्त संसार के तत्वज्ञान से लोक और परलोक दोनों में उपलब्धि होती है। आवश्यकता है जीवन, जगत्, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, चिकित्सा, खेती-बाड़ी, राजनीति, व्यापार आदि विभिन्न क्षेत्रों में इसके महत्व को समझे जाने की। लेकिन विडंबना है किसी न किसी राजनीतिक दल, मजहब, संप्रदाय, पूंजीपति आदि का अंधानुकरण करते हुये भारत में सोशल मीडिया इनफलूएंसर और मुख्य-धारा का मीडिया दोनों मिलकर जनमानस की वैचारिक,तार्किक, निर्णयात्मक शक्ति को मारने का काम कर रहे हैं। युवा- वर्ग विशेष रूप से किंकर्तव्यविमूढ़ है। भ्रष्टाचार की अति की वजह से वास्तविकता और कल्पना की खाई बहुत गहरी बन चुकी है। कल्पनाओं को वास्तविकता में रुपांतरित करने के अवसर न के बराबर हैं।युवा- वर्ग में इससे आपराधिक प्रवृत्ति, छेड़खानी, बलात्कार,हिंसा, ईर्ष्या,द्वेष, तनाव, चिंता, अवसाद में बढ़ोतरी होती जा रही है। कोई किसी को सुनने के लिये तैयार नहीं है। नैतिक जीवन- मूल्यों का पतन जैट गति से होता जा रहा है।
सोशल मीडिया इनफलूएंसर युवा -वर्ग में अंधप्रतियोगिता को जन्म दे रहे हैं। सिस्टम की ओर से सुविधाएं और अवसर नगण्य हैं लेकिन युवा- वर्ग ऐसे कल्पनालोक में विचरण कर रहा है,जो हकीकत में भारत जैसे भ्रष्ट सिस्टम के देश में संभव नहीं है। कल्पना और वास्तविकता में हिमालय पर्वत से भी बड़ा अवरोध मौजूद है। सोशल मीडिया ने दुनिया का हित की अपेक्षा अहित ही अधिक किया है। इसने युवा -वर्ग में इतनी महत्वाकांक्षाएं जगा दी हैं कि उनका एक प्रतिशत भी पूरा होना मुश्किल लगता है। सिस्टम की तरफ से भारी- भरकम टैक्स लेकर भी जनमानस को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवाई जा रही हैं।काम के लिये आधारभूत ढांचा विकसित नहीं किया जा रहा है। जब जमीनी ढांचा ही विकसित न हुआ हो तो रोजगार कहां से पैदा होंगे? उद्योगपतियों और कोरपोरेट घरानों को बहुतायत से सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं। जनता जनार्दन की गाढी कमाई का अधिकांश धन -दौलत बैंकों, उद्योगपतियों,कोरपोरेट घरानों, विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, दलालों तथा इनके सहयोगियों के पास एकत्रित हो चुका है।देश की 8-10 प्रतिशत आबादी युरोपीयन शैली का पांच सितारा भोग -विलास का जीवन जी रही है जबकि 90 प्रतिशत आबादी या तो सरकारी भीख पर निर्भर है या फिर हाड़तोड़ मेहनत करके अपना काम चला रही है। सिस्टम की ओर से इस आबादी के लिये कोई विशेष सुविधा उपलब्ध नहीं है। कोई अपना काम करना चाहे तो सरकारी मशीनरी में मौजूद भ्रष्टाचार और पूंजीपतियों द्वारा निर्मित सामान की कीमत के सामने वह टिक नहीं पाता है। देशद्रोह मानकर असहमति में उठी हुई हरेक आवाज को बलपूर्वक दबा दिया जाता है। किसी भी स्तर पर संवाद, बातचीत,मेल-मिलाप और एक दूसरे के विचारों को समझने की सहनशक्ति समाप्त हो चुकी है।अशिक्षित,बेरोजगार, बदहाल,गरीब और नासमझ जनमानस का माईंड वाश होने से वह किसी विरोधी विचारधारा के राजनीतिक दल,संगठन, समाज,समूह और संप्रदाय के लोगों की बात को सुनना ही नहीं चाहता है।वह इसे सीधे दुश्मनी के रूप में ले लेता है। भारत में ‘दर्शनशास्त्र’ विषय की पढ़ाई- लिखाई बंद होने से यह समस्या अधिक विकराल रूप धारण कर चुकी है।इसको समाप्त करने के लिये यदि कोई प्रयास करता है,तो उसे किसी अन्य राजनीतिक दल, समूह, संगठन,समाज और संप्रदाय का दलाल कहकर उसकी आवाज बंद करवा दी जा रही है।
धर्माचार्यों, नेताओं और जातिवादी सुधारकों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि जिसमें असहमति हिंसा में तब्दील हो रही है। सहनशक्ति जवाब दे चुकी है। किसी भी मुद्दे पर असहमति होने पर परस्पर संवाद लगभग समाप्त हो चुका है। अब संवाद, बातचीत और सहनशीलता का स्थान विरोध,दुश्मनी, हिंसा,वैरभाव और मारामारी ने ले लिया है। संप्रदाय, मजहब, राजनीति, समाज, शिक्षा आदि हरेक क्षेत्र में असहमति के लिये कोई स्थान नहीं बचा है।या तो किसी की बात को स्वीकार करके उसके पीछे-पीछे चल पड़ो या फिर असहमति के परिणामस्वरूप दुश्मनी का सामना करो। वैसे तो बड़ी डींगें हांकी जा रही है कि पिछली दो सदियों के दौरान विकास ने नयी ऊंचाईयों को स्पर्श किया है लेकिन वैचारिक पिछड़ापन चरम पर है। जनसाधारण ही नहीं अपितु पढ़े लिखे और प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोगों का भी यही हाल है।वो भी इस असहमति को स्वीकार नहीं करने की महामारी से ग्रस्त हैं। विश्वविद्यालय तो इस मामले में अति पिछड़ेपन का शिकार हैं। वैचारिक स्वतन्त्रता का गला घोंट दिया गया है। असहमति को दुश्मनी के रूप में लिया जाता है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र- 136119



