साहित्य

मौन है वसुंधरा

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

मौन है वसुंधरा, कुछ कहती नहीं,
पर हर पत्ती में उसकी पीड़ा बहती कहीं।
नीला आकाश भी आज चुपचाप है,
धरती का मन जैसे उदास है।
पहाड़ों की चोटी भी झुक सी गई,
नदियों की धारा भी रुक सी गई।
हवा के झोंकों में एक सिसकी है,
मिट्टी की खुशबू में भी एक फुसफुसाहट सी है।
कभी जो हँसती थी फूलों के संग,
आज चुप बैठी है समय के ढंग।
पक्षियों का संगीत भी थम सा गया,
वन का हर पथ अब गुम सा गया।
मानव की दौड़ ने सब छीन लिया,
उसका हर सपना भी म्लान किया।
फिर भी धैर्य से सब सहती है,
माँ बनकर सबको ही रहती है।
एक दिन फिर हरियाली आएगी,
वसुंधरा फिर गीत सुनाएगी।
बस सुन लो उसके मौन की वाणी,
धरती माँ की यही कहानी।

स्वरचित/ मौलिक
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़

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