साहित्य

अमन रहे

महेजबीन मेहमूद राजानी

बारूद की बू से घुटती ये हवा क्यों है
हर चेहरे पे खामोशी की सजा क्यों है.
सरहद पे धधकती नफ़रत की ये ज्वाला
इंसान ही इंसान से खफा क्यों है.
कल तक जो बसे थे खुशियों के नगर में
आज हर गली वीरान पड़ी क्यों है.
मां की दुआओं में कांपती सी सिसकी
हर आंख में अश्कों की घटा क्यों है.
रोटी भी महंगी मेहनत भी बेअसर
हर घर में तंगी का साया खड़ा क्यों है.
तेल और गैस की बढ़ती ये कीमतें
हर रोज़ नया एक इम्तिहान सा क्यों है.
आओ कि सभी देश मिलकर कसम खाएं
अब नफ़रत का कोई भी दर न खुले.
हथियार झुकें और दिल उठें ऊपर
अमन का परचम हर सरहद पे फहरे.
बस एक ही आवाज गूंजे जमाने में
युद्ध विराम हो अब और न जले.
इंसानियत जिंदा रहे हर कोने में
मोहब्बत से ही ये जहां फिर पले.

महेजबीन मेहमूद राजानी
सड़क अर्जुनी /महाराष्ट्र
9423415191

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