
क्यों जब विपरीत समय आता है?
मन का दीपक डगमगाता है।
आपत-विपदा जब घेर लेती।
हृदय संशय में भर जाता है।
विश्वास कहीं खो सा जाता।
साहस भी साथ छोड़ देता।
छाया बन डर पास खड़ा,
हर निर्णय को तोड़ देता।
एक ओर आशा की किरण,
दूजी ओर अंधियारा गहरा।
मन के भीतर द्वंद्व जगे।
संकल्प हुआ फिर कितना ठहरा।
द्वंद्व की ज्वाला जलती भीतर,
सत्य-असत्य का होता मंथन।
कभी हाँ तो कभी ना बोले,
भटक रहा मन, खोता चिंतन।
कभी लगे सब ठीक हो जाएगा।
कभी लगे सब व्यर्थ यहाँ,
द्वंद्व भरे इन प्रश्नों में ही,
ढूँढे मन अपनी ही दिशा।
पर जो थामे धैर्य की डोरी,
वह पार भी उतर जाता है।
द्वंद्व के बादल छँटते ही,
जीवन फिर मुस्काता है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार



