
छत की मुंडेरों पर चहकती थी जो,
वो नन्ही सी गोरैया कहाँ खो गई?
कभी आँगन की रौनक थी जो,
आज यादों में बस वो रह गई।
तिनका-तिनका जोड़ बनाती थी घर,
मेहनत की मिसाल वो सिखा जाती थी,
छोटी सी चोंच में बड़ा सा हौसला,
जीवन जीना हमको बता जाती थी।
अब कंक्रीट के जंगलों में,
उसकी आवाज़ सुनाई नहीं देती,
हमारी ही भागदौड़ में कहीं,
उसकी दुनिया समाई नहीं रहती।
आओ फिर से उसे बुलाएँ,
छोटे-छोटे घोंसले सजाएँ,
पानी दाना रख दें आँगन में,
उसकी चहक से घर महकाएँ।
गोरैया सिर्फ एक चिड़िया नहीं,
हमारी यादों की पहचान है,
उसे बचाना हम सबका फ़र्ज़,
यही सच्चा मानव धर्म और सम्मान है।
बीना पाटनी उत्तराखंड
मौलिक स्वरचित




