
अब गौरैया ने आँगन में, आना छोड़ दिया।
वृक्ष काटकर नीड़ मनुज ने, उसका तोड़ दिया।।
स्वार्थ पूर्ति खातिर मानव ने, काटे हैं जंगल।
मधुरिम ध्वनि में कैसे गाए, गौरैया मंगल।।
क्लांत-श्रांत हो जान नन्ही ने, रुख यूँ मोड़ दिया।
अब गौरैया ने आँगन में, आना छोड़ दिया।।
चुंबकीय विकिरण से मानव, ने जोड़ा नाता।
वायु प्रदूषण घातक प्रतिपल, बढ़ता ही जाता।।
खगोलीय नित ही प्रयोग कर, अंबर फोड़ दिया।
अब गौरैया ने आँगन में, आना छोड़ दिया।
इस विकास के धावन पथ चल, कंटक ही बोए।
धरती रोए अंबर रोए, मानवता रोए।।
गुणा भाग के समीकरण में, घाटा जोड़ दिया।
अब गौरैया ने आँगन में, आना छोड़ दिया।।
सद्यरचित
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




