
अल्प वेतन में किसको,
क्या-क्या मैं दिलवाऊँगा,
सीने पर पत्थर रखकर,
पहले बेटा-बेटी पढ़ाऊँगा।।
घर की चाहत, रिश्तों के ताने,
मन को रोज़ जलाते हैं,
आँसू पीकर भी हर दिन,
हँसता चेहरा ही दिखलाऊँगा।।
पत्नी की उम्मीदें भारी,
अपनों की बातें चुभती हैं।
टूटे सपनों के टुकड़ों से,
फिर भी घर को सजाऊँगा।।
खुद की खुशियों को मैंने,
जैसे गिरवी रख डाला है।
बच्चों के उज्ज्वल कल हेतु,
हर दुःख को अपनाऊँगा।।
थक जाता हूँ कभी-कभी मैं,
जिम्मेदारी के बोझ तले।
पर उनके सुनहरे सपनों को,
कैसे मैं झुठलाऊँगा।।
रातों की नींदें बेचकर भी,
दिन में श्रम करता रहता हूँ।
उनकी हर एक मुस्कान पे,
अपना जीवन लुटाऊँगा।।
“दिव्य” यही संघर्ष मेरा,
जीवन की सच्ची गाथा है।
अल्प वेतन में भी देखो,
घर को स्वर्ग बनाऊँगा।
अल्प वेतन में किसको,
क्या-क्या मैं दिलवाऊँगा,
सीने पर पत्थर रखकर,
पहले बेटा-बेटी पढ़ाऊँगा।।
कवि:दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश



