
ख्वाहिशों की भी एक ख्वाहिश थी
मुझसे मिल सके वो एक बार
ढूंढा बहुत पर मुझसे मिल ना पाई
लौट जाती हर बार वो खाली हाथ
उलझनें सुलझाते खुद में उलझ जाती हूं
कहां ख्वाहिशों से मैं भी मिल पाती हूं
बस यूं ही जिंदगी के बहाव में बह जाती हूं
बस कुछ एहसासों को ही लिखती रह जाती हूं
साफ कुछ दिख नहीं पाता धुंध जब छा जाता हैं
है एक सुनहरी रोशनी वो थोड़ी राह दिखाती हैं
वो आगे आगे चलती हैं मैं पीछे-पीछे चलती हूं
जिन ख्वाहिशों से मिल नहीं पाती
उसे कल्पनाओं में ढूंढ़ा करती हूं
यूं ही जिंदगी के सफर में
अकेले ही सफर किया करती हूं।
©स्वरचित मौलिक रचना
तृषा सिंह
देवघर, झारखंड




