
विश्व कविता दिवस विशेष.
मन के भावों की माला
जब शब्दों में ढल जाती है।
संवेदनाओं के मोती की चमक
पंक्तियों में पिघल जाती है।
जन्म लेती कविता तभी
आत्मा से आत्मा के परिचय
हेतु मचल जाती है।
कभी बच्चों सी विचारों की स्नेहिल थपकियों से बहल जाती है।
कभी कल्पनाओं के बड़े महलों की ओर निकल जाती है।
वेदनाओं के सागर में लगाती डुबकियां,सहजता के सौंदर्य में बदल जाती है।
कविता कभी सहमती नहीं
जब भी कलम थमती हाथों में
शाश्वत सत्य की खोज में चल जाती है।
कविता नहीं थकती कभी
भावनाओं के अति प्रवाह में
टहल जाती है।
कविता नहीं होती हताश
सदैव निर्भय उच्चश्रृंखल रहकर भावों की नदियों में
उतर जाती है।
तो कभी….
कविता मासूम सी बालिका की तरह , मानस पटल में खिलखिलाती सी उछल जाती है।
हाँ प्यारी सी कविता,
न्यारी सी कविता!!!
डॉ. नवनीता दुबे नूपुर©®✍️मंडला,मध्यप्रदेश,मौलिक।




