साहित्य

साहित्य अकादमी : मेरी मौत का तमाशा देखो (हास्य-व्यंग्य)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

इस बार हिंदी की संस्मरण की पुस्तक पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल गया। साहित्य जगत में कोई हल्ला नही हुआ कि इस पुस्तक में आखिर है क्या? एक लेखक की आत्मा जुबान में आकर अटक गयी। हमने तो देहरादून की वादियों का संस्मरण लिखा था।

अरे निर्णायक मंडलों, थोड़ा नजर ही फेर लेते तो हमरे को ही मिल जाता। मैं अपनी प्रेयसी के साथ प्रकृति का एक- एक क्षण समावेश किया था। देहरादून के कोने-कोने की नजाकत का एक-एक पल समेटा था।

आखिर तिरछी नजरों से ही देख लेते। एक-एक वाक्य में घुंघरू से छम-छम करते शब्दों को पिरोया था। संगीत की स्वर लहरिया डाली थी। इंद्रधनुषी छटा थी। मनोहारी दृष्य था।

पान गुटखा हम खिला देते। किसी रेस्टोरेंट में तरह-तरह के व्यंजनों से जिह्वा की भूख शांत कर देते। जो कहते खर्चा करते। दूध का घूंट पिला देते। कहते तो अपनी प्रेयसी को एक दिन का अनुदान कर देते। हमारी प्रेयसी थोड़ी नाराज होती। एक बार साहित्य अकादमी की धारा में डुबकी लगा लेता तो जिंदगी तर जाती। बार-बार आवागमन से मुक्ति मिल जाती।

हम लिखते रहते हैं। स्त्री विमर्श में मत सहयोग करो लेखकों, नहीं तो एकदम नइया डूब जायेगी। जो पुरस्कार हमको मिलना था। महिला मंडली बाजी मार ले गयी। अब जीवन का समस्त संस्मरणों की होलिका दहन कर जाऊंगा।
अब सोंचता है उसी देहरादून की अंतिम छोर पर बसा एक पहाड़ी है। उस पर चढ़कर जहर की एक पुड़िया खाकर अपनी प्रेयसी से क्षमा मांग कर अपनी अंतिम जीवन लीला इस मधुर पहाड़ी से कूदकर समाप्त कर लूँ।

जीवन की एक ही आशा थी कि मेरे संस्मरण पर अकादमी की नजर टिकेगी। पर होनी को कौन टाल सकता है। इस संस्मरण में अपनी मौत भी जोड़ रहा हूँ। अकादमी वालों मेरी मौत का तमाशा देखो।

……….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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