
नन्ही सी है जिसकी जान,
आँगन की वह प्यारी शान।
फुदक-फुदक कर दाना खाती,
चीं-चीं कर सबको जगाती।
अब न दिखती वैसी रौनक,
खो गई उसकी मधुर खनक।
आओ मिलकर हाथ बढ़ाएं,
प्यारी गौरैया को बचाएं।
© ललन प्रसाद सिंह
वसंत कुंज, नई दिल्ली-70

नन्ही सी है जिसकी जान,
आँगन की वह प्यारी शान।
फुदक-फुदक कर दाना खाती,
चीं-चीं कर सबको जगाती।
अब न दिखती वैसी रौनक,
खो गई उसकी मधुर खनक।
आओ मिलकर हाथ बढ़ाएं,
प्यारी गौरैया को बचाएं।
© ललन प्रसाद सिंह
वसंत कुंज, नई दिल्ली-70