
रूठ न जाना मात भवानी ,हम भक्तन है अज्ञानी।
भूल हुई है जो भी हमसे ,क्षमा करो अंबे रानी।।
एक बार बस दर्शन दे दो ,अपने पलके झपकाओ।
रहे नहीं यह चाह अधूरी ,आओ मांँ गले लगाओ ।।
स्वागत में पुष्प हार लाई , दृग में भर आए पानी।
रूठ न जाना मात भवानी ,हम भक्तन है अज्ञानी ।।
नग्न पाँव ही दौड़ी आई, सुनकर गौरी जयकारें ।
मन में बहने लगती गंगा, आकर मांँ तेरे द्वारे ।
दुख हरने वाली देवी, तुमसे क्या व्यथा सुनानी।
रूठ न जाना मात भवानी, हम भक्तन है अज्ञानी ।।
मन थोड़ा सा लोभी है, कैसे इसको समझाऊंँ।।
कालरात्रि राह दिखाओ।
दलदल में फंस न जाऊंँ।।
बिन मांँगे ही देने वाली, तुमसा कोई हैं दानी।।
रूठ न जाना मात भवानी, हम भक्तन है अज्ञानी।।
किरण कुमारी ‘वर्तनी’ जमशेदपुर




