
युध्द मत करो
ये युध्द जो होतें हैं
जिंदगी को कराहते
यूँ ही छोड़ देते हैं
ये निकलती हुई आवाज
धमाकों से गिरते घर
अनाथ होते बच्चे
बर्बाद होती फसलें
युगों से बने
सांस्कृतिक विरासत
पर युध्द की मार से
बदल जातें हैं रिश्ते
ध्वस्त हो जाते हैं
मानवीय संवेदना
युध्द के लिए
तुम नहीं पैदा किये गये हो
एक नवयुग का निर्माण करो
नवगीत लिखो
इस घिनौनी हरकत को
खत्म करो दुनिया वालों
खत्म करो नफरत के बीज
एक नया आसमां बनाओं
नये बगीचे लगाओ
युध्द से हार ही स्वीकार कर लो
अलग कर लो स्वयं को
बचा लो मानवता को
मेरे देश के आकाओं
बचा लो…
…..
जयचंद प्रजापति ‘जय’
जैतापुर, हंडिया, प्रयागराज.



