
गांवों की पगडंडियाँ, सूनी-सूनी आज।
मिट्टी की सौंधी महक, करती मन में साज़॥
बरगद की वह छाँव भी, अब न करे संवाद।
चौपालों की चुप्पियाँ, बुनती शोक-प्रसाद॥
कोयल की मीठी तान, खोई बाग-बगीच।
सूनी गलियों में बची, स्मृतियों की रीत॥
खेतों की हरियालियाँ, लगती अब अवसाद।
शहरों की चकाचौंध में, बसता जीवन-वाद॥
रोज़गार की खोज में, दूर गए संताप।
ममता द्वारे रह गई, करती नित प्रतिचाप॥
झुकी कमर वह बाप की, ताके दिन-रैन।
आहट-आहट पर लगे, आएँगे अब चैन॥
हिलने लगीं जड़ें सभी, संस्कारों के मूल।
रिश्तों की ऊष्मा गई, बनकर शीतल शूल॥
गांवों का पलायन यह, केवल बदले ठाँव।
जड़ों से बिछुड़ाव की, पीड़ा का है गांव॥
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल, उत्तर प्रदेश*




