साहित्य

उछलते -छिटकते मुद्दे ( हास्य व्यंग्य )

वीणा गुप्त

और फिर  एक बार विक्रम  बेताल की ओर बढ़ा। उसे पेड़ से उतारा, कंधे पर डाला और चल दिया गंतव्य की ओर। सहसा ही बेताल अट्टहास कर बोला, ” सुन रे विक्रम ! मेरी बात। सुनना, गुनना, और उत्तर देना। चुप रहा तो तेरा मटियामेट होगा और बोला तो मैं उड़न छू। बोल है मंजूर?” विक्रम बेचारे के छक्के छूट गए।
इस मुर्दे से बेताल ने युगों- युगों से उसकी जान सांसत में की हुई है। बच्चू हाथ ही नहीं आता। बातें तो सुनो इसकी। चित भी इसकी, पट भी इसकी,और अंटा भी इसके बाप का। अब क्या करे विक्रम ? टारगेट हासिल करने का सवाल है। विक्रम उसे छोड़ने वाला नहीं, बेताल हाथ आने वाला नहीं। यह डाल -डाल, तो वह पात- पात। सिचुएशन जस की तस। अजब कशमकश है।
आज के संदर्भ  में बेताल है मुद्दा। विक्रम मुद्दे को मीडिया  तक पहुँचाने वाला। अनेक बेताल हैं , अनेक विक्रम हैं ,जो मुद्दों को न जाने कौन -कौन सी कब्रों से खोद लाते हैं। समय और प्रासंगिकता  के अनुसार , ये मुद्दे लीप पोतकर,विविध मंचों पर हंगामा  बरपाने के  लिए  उतार दिए जाते हैं। दो- तीन दिन की गहमा गहमी के बाद, मुद्दे,
“चल खुसरो घर आपुने,
रैन भई परदेस ”
गुनगुनाते हुए फिर अपनी -अपनी कब्रों में  उतर, आराम फ़रमाते हैं ,और नौकरी का मारा, विक्रम फिर किसी सॉलिड मुद्दे की तलाश में ,भटकता है।
दफ्तर की मेजों पर  रखी पानी की बोतलें, समोसे की खाली प्लेटें, सॉस के पॉउच,और खाली- खाली कुर्सियाँ, मीटिंगों के इसी शाश्वत अंजाम पर,गंभीरता से विचार- विमर्श करते नज़र आते हैं।

हांँ , तो भई, हमारा बेताल भी मंच पर उतर आया। पलक झपकाते हुए बोला,”तो सुन रे विक्रम !  कहानी पुरानी । मुझ बेताल की  जुबानी।” बेताल शुरू हो गया।

“एक था आलू। एक था कचालू । एक बार दोनों रातभर गायब हो गए। सुबह आए तो लोगों  ने पूछा, “आलू , कचालू बेटा कहाँ गए थे? सकपकाया सा उत्तर  मिला-
“———– में सो रहे थे।
“————-ने लात मारी, रो रहे थे।
“————-ने  गुड़ दिया, हँस रहे थे।
कहानी हुई खत्म। पैसा हज़म होना बाकी है।  बेताल ठठा कर हँसा। बेटे विक्रम! ये डैश याद रखना। यही सब कुछ है। अब जबाब  दे।
“आलू- कचालू किस पार्टी,प्रदेश, जाति ,वर्ग ,धर्म से जुडे़ हैं।

उनसे कौन जबाबतलवी  कर रहा है ? उनके खुद के माँ बाप, या उनके माई बाप ।

आलू- कचालू किसके शरणागत हुए ?
इन दोनों  का अपना स्टे क्या है? कुछ पाने पर हँसना,और लतियाए जाने पर रोना।

क्या स्ट्रेटैजी है इनकी?
सोच -समझ कर बोल। नहीं तो तेरा डिब्बा गोल। ”

विक्रम सब जानता है। वह आलू-कचालू के पूरे खानदान की रग- रग से वाकिफ़ है। पर कैसे बताए ? बताए तो मुद्दा  हाथ से फिसले, चुपाए तो मुद्दा उग्र हो जाए। क्या करे ? बेचारा सहता है और कहता है। कहने और सहने के दो पाटों में पिस कर उसका कचूमर बन गया है।
अब विचारणीय बात यह है कि विक्रम क्यों  बेताल यानि मुद्दे के  पीछे पगलाया जा रहा  है । कुछ तो बात ज़रूर है। आग है, तभी तो धुँआ दिख रहा है। पानी जमा हो रहा है,तो गढ्ढा भी जरूर है। लेकिन जो बात विक्रम को दिखाई दे रही है , हम उसे देखना ही नहीं  चाहते। मजे की बात हमें  पेड़, पत्ते, फूल, बाग, वन, गुरु द्रोण सब नज़र आते  हैं, नज़र नहीं आती तो बस चिड़िया  की आँख। मतलब यह कि हमारी सारी कदम ताल उसी मुद्दे के आस-पास होती हैं,पर मजा़ल है  कि कोई एक भी कदम आगे-पीछे खिसक जाए।
एक जमाना था जब लोग मुद्दों का फौरन निबटारा  करते  थे। न्याय की ऐसी -तैसी तब भी  होती थी, पर आज जैसी नहीं। एक उदाहरण लें , त्रेता युग से। गुरु विश्वामित्र के साथ , राम- लखन प्रातः भ्रमण के लिए निकले लिए  हैं। रास्ते  में  शिला अहल्या को देखा, गुरुजी से  पूछा। सारी बात जानकर श्रीराम ने तुरंत निर्णय  लिया। अहल्या को मानवी बना दिया। राम निर्णय -क्षम हैं, सहृदय हैं। सबसे बड़ी बात वह  लाईम लाइट में आना नहीं चाहते। परदे के पीछे  रहकर सब काम निबटा देते हैं। गौतम तक खबर पहुँचती है। वे कोई चूँ- चपड़ नहीं  करते। पहले ही  इंद्र के चक्कर में बड़े  विवाद में  फंँसते-फँसते बचे थे। दूध का जला छाछ भी फूँक -फूँक कर पीता है। खैर यह त्रेता था। ऋषि साफ बच गए।
वैसे भी तब लोग, इंसान हुआ करते थे। आज जैसे होते तो यह मुद्दा त्रेता, द्वापर ,कलियुग, फिर समाज,पंचायत,निचली -उपरली अदालत और कोर्ट के चक्कर लगा -लगा कर , मी. टू़ .तक उछल आता और बेकुसूर पाषाणी अहल्या न्याय की आस में  दुनिया से  कूच कर जाती । हम मोम बत्तियाँ  लेकर ,संसद से सड़क तक साइलेंट मार्च करते। काश! आज भी राम आते ।

आज मुद्दे  उछालने का फैशन सा हो गया है। किसी की नीयत, और नीति इन्हें सुलझाने की,कतई नहीं  है।  बडे- बडे मरे हुए लोग भी मुद्दा बनकर जी जाते हैं। बतौर उदाहरण, एक महानुभाव, जो बरसों से मरे पडे थे, एक दिन सहसा ही जिंदा़ होने को आतुर हो उठे। किसी लोकल विक्रम को  पकड कर सोशल मीडिया पर फुसफुसा दिया,” “अमुक ने ,अमुक बरस, अमुक दिन, अमुक विषय  पर मुझ बेचारे की नाक काटी थी।  सिस्टम की कोताही  के कारण अब तक मुँह बंद किए पडे़ थे। अब मीडिया ने उन्हें  हिम्मत दी, तो मुखर हुए। ”  फिर क्या था। सारे के सारे  विक्रम नहा- धोकर, अमुक सज्जन और रीसेंटली जीवित सज्जन के पीछे  पड़ गए।  हर मीटिंग, सभा, संसद में इसी मुद्दे  पर तू -तू , मैं-मैं हुई, जूतम-पैजा़री हुई,पत्थर उछले, फोटो खिंचे और फिर बेताल मगन मन, पेड़ पर जा लटका। हर मुद्दे  का वही सुनिश्चित अंजाम।

हरि अनंत हरि कथा अनंता

की तरह ही मुद्दे भी अनंत हैं। मसलन
बजट कैसा होगा?
टैक्स में  रियायत मिलेगी या नहीं?
आलू की एम .आर. पी सरकार  तय करेगी तो किसान उसे मानेगा या धरने पर बैठ जाएगा?
कितने आम  खास बनेंगे और कितने खास चूसकर गुठली की तरह फेंक दिए जाएंगे।
भगवा और हरा कब तक धर्म के ठेकेदारों की पौ बारह करते रहेंगे?
कौन सी पार्टी, जुगाड़ लगा सत्ता पर क़ाबिज़  होगी ? आदि- आदि।

मुद्दों  की बहुत वैरायटी है। घोटालों का मुद्दा है, हीलों का मुद्दा  है, हवालों का मुद्दा  है। सरहद का मुद्दा  है, हद का मुद्दा  है। धर्म  का मुद्दा  है अधर्म  का मुद्दा है। नीति- अनीति का मुद्दा है। प्यार का मुद्दा  है, तकरार का मुद्दा  है। छोटे  से लेकर  बड़े तक। राई से पर्वत तक। हमारे पास मुद्दों का समुंदर है। हर आती -जाती लहर ,हमारी ओर कोई न कोई मुद्दा  उछाल जाती है। जिसे  हम  अपनी मन मर्जी के मुताबिक कैच कर लेते  हैं और  गली-मुहल्ले ,नुक्कड , आफिसों में  उसकी छीछालेदर करते  हैं और बाद  में,” होगा  वही जो राम रचि राखा” बोलकर  गेंद राम जी के पाले में  डाल देते हैं,और  मुद्दा ओवर लोडेड राम जी की फाईलों में दब कर बेहोश हो जाता है। फिर सदियों  बाद कोई मंच पर उतरने को बेताब विक्रम आता है, मुद्दे  को निकाल कर, उसे होश में  लाता है।
वैसे मुद्दे समयानुकूल  रूप बदलते हैं।
पहले लड़की को कैसा लड़का मिलेगा ,यह चिंता का विषय  था। आज लड़के  को कैसी लड़की  मिलेगी, यह  गंभीर चिंतन का विषय है।
पहले  बच्चा, बाप के साथ काम पर बैठता था। आज बच्चा पढ-लिख कर फुर्र हो जाता है। माँ- बाप उसकी एक वीडियो कॉल पर निहाल हो जाते हैं।उसके हैंडसम पैकेज पर बलि-बलि जाते हैं।
पहले राजनीति में नीति हुआ करती थी, आज हमने उसमें से राज को छान लिया है, नीति डस्टबिन में पड़ी है।

वैसे मुद्दों का उछलना- छिटकना बिल्कुल  निरर्थक  नहीं  है । आम आदमी के जीवन में  इनकी बहुत अहमियत है।  ये हमारे रक्तचाप  को कंट्रोल करते  हैं। हमारे  डिप्रेशन को अभि व्यक्ति  देते हैं। हमारा मुफ्त मनोरंजन करवाते  हैं। हमें  गृहस्थी  की अजर -अमर समस्याओं  से  कुछ पलों के लिए निजात दिलवाते हैं और  हमारे  जीवन की एकरसता  को भंग करते  हैं। हमें जीने की वजह देते हैं। यदि हम ज्यादा  वोकल हो जाएं  तो  ये हमें  कुछ समय के लिए सुर्खियों में भी जगह दिला देते हैं। ये हमारे  लिए  संजीवनी  हैं। इसके  लिए  हम विक्रम और बेताल के आभारी हैं।
लगे रहो विक्रम ,लगे रहो वेताल। छिटकाते रहो मुद्दे , काटते  रहो बवाल। कभी तो सुधरेगी जमाने की चाल। जी हाँ, हम घोर आशावादी जो  हैं।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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