साहित्य

ग़ज़ल

किरण कुमारी 'वर्तनी'

उसने तरकीब क्या निकाली है,
रूठे को झट से ही मना ली है।

हर जुबा पर है नाम उसका ही ,
खास पहचान जो बना ली है ।

एक पल भी जिया नहीं जाता,
नींद बेरहम ने उड़ा ली है ।

मार महंगाई का दिखे घर- घर ,
भोजन की थाली आज खाली है ।

है खुशी लोग से न की पैसा,
लोभ के चश्मे को हटा ली है।

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