
देखी थी मैने कल
करीने से तह करके रखी
असंख्य तारों से जड़ी वह
ओढ़नी ..,दिल के आलमारी में
जिससे जुड़ी हुई हैं यादें तुम्हारी -और
जिसमें समाई हुई है खुश्बू हमारे प्यार की
उस ओढ़नी में ,
जो ,रखी है दिल के आलमारी में
उस रात आया
तूफान जीवन में
जो …,
ले गया संगअपने
खुशियाँ
और …,
दे गया
अंधेरा असीम
ग़म और आँसू
रूप में ,
वहीं
रंग गई वो खूबसूरत ओढ़नी
स्याह रंग में
उसमें जड़े हुये -तारे
चमकते हैं
आज भी -और
टूटते हैं –फिर
कहीं दूर हो जाते हैं -गुम
सदा के लिए
पर ,
ओढ़नी चमकती रहती है सदा
सजी हुई तारों से और
देती है हौसला
जीवन में अंधेरों से लड़ने की
असंख्य तारों से से सजी वह ओढ़नी ||
*शशि कांत श्रीवास्तव*
*डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब*
©स्वरचित मौलिक रचना
04-04-2026




