चलती कार में सजी काव्यधारा: शब्दों से महका सफर
गोरखपुर–पडरौना मार्ग से विशेष साहित्यिक समाचार

यात्राएँ सामान्यतः दूरी तय करने का माध्यम होती हैं, परंतु जब उनमें साहित्य का रस घुल जाए तो वही यात्रा एक अविस्मरणीय अनुभव बन जाती है। कुछ ऐसा ही मनोहारी दृश्य उस समय देखने को मिला, जब गोरखपुर से पडरौना और पुनः वापसी के दौरान एक चलती कार काव्य मंच में परिवर्तित हो गई।
“जहाँ मिल बैठे चार यार” की कहावत को साकार करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार सुभाष यादव की अध्यक्षता में एक सहज, आत्मीय एवं सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। इस अनूठी गोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार एवं ज्योतिषविद नन्दलाल मणि त्रिपाठी ‘पीताम्बर’, दिनेश गोरखपुरी, भारतेन्द्र सिंह, दयानंद त्रिपाठी ‘व्याकुल’ तथा डॉ. शिवेश्वर दत्त पाण्डेय ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई।
गोष्ठी का संचालन डॉ. पाण्डेय द्वारा अत्यंत सहज एवं प्रभावशाली ढंग से किया गया, जिसने पूरे वातावरण को एक सूत्र में बाँधे रखा। हिन्दी और भोजपुरी की मधुर रचनाओं ने यात्रा को न केवल आनंदमयी बनाया, बल्कि साहित्यिक संवाद को भी नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।
चलती कार में गूँजती कविताएँ, शब्दों की तरंगों पर झूमते साहित्यकार, और मार्ग के साथ-साथ बहती भावनाएँ यह दृश्य किसी साहित्यिक स्वप्न से कम नहीं था। यह काव्य गोष्ठी इस बात का प्रमाण बन गई कि सृजन के लिए मंच की नहीं, बल्कि मन की आवश्यकता होती है।
इस अद्भुत आयोजन ने यह संदेश दिया कि साहित्य कहीं भी, कभी भी, किसी भी रूप में जीवित रह सकता है बस उसके लिए संवेदनशील हृदय और सृजनशील मन चाहिए।




