आलेख

बलड़ी(हरसूद) की वह भौतिक धरती नर्मदा मैया की गोद में विश्राम कर रही है

डॉ. मुश्ताक़अहमद शाह सहज़

हमारी स्मृतियों की नदी जब बहती है, तो वह केवल शब्दों को नहीं, बल्कि एक पूरे कालखंड को जीवंत कर देती है। पुराने हरसूद की तहसील का वह गौरवशाली गाँव बलड़ी, जो आज नर्मदा के अथाह जल में समाया हुआ है,  यादों के जरिए एक बार फिर अपनी पूरी भव्यता के साथ यहाँ उभर रहा है। एक फिल्म के स्क्रीन की तरह।


यहाँ आपकी भावनाओं, स्थानों की विशिष्टता और उस दौर की संस्कृति को समेटता हुआ एक  आलेख प्रस्तुत है।
स्मृतियों का बलड़ी, एक गाँव जो दिल में धड़कता है
दुनिया के नक्शे पर शायद वह स्थान अब ‘डूब क्षेत्र’ कहलाता हो, लेकिन हमारे ज़ेहन में बलड़ी (हरसूद) आज भी वैसा ही आबाद है,वही सोंधी मिट्टी, वही ऊंचे सागौन के पेड़ और वही अपनत्व से भरी गलियाँ। वह गाँव हमारा सबका प्यारा था, क्योंकि वहाँ रिश्तों में कोई दरार नहीं थी।
प्रकृति और परिवेश,,,जहाँ सुकून बसता था
बलड़ी की सुबह नर्मदा नदी की शीतल लहरों और अमराई में कोयल की कूक से शुरू होती थी। वह बावड़ी जिसका पानी अमृत समान था, और वह स्कूल जहाँ शिक्षकों के अनुशासन ने हमें गढ़ना सिखाया। गाँव की चौपाल पर होने वाली चर्चाएं किसी संसद से कम नहीं थीं, जहाँ छोटे-बड़े का मान और सामूहिक निर्णय की परंपरा थी। खेत-खलिहान अनाज से भरे रहते थे और घरों के खूंटों पर बँधे गाय-बैल परिवार का हिस्सा हुआ करते थे। गंगा-जमुनी तहजीब और आस्था के द्वार
बलड़ी की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्कृति थी। यहाँ आस्था के दो मज़बूत स्तंभ थे,एक ओर बैडे वाले पीर बाबा का दरश-परस था, जहाँ हर दुखी मन को शांति मिलती थी, तो दूसरी ओर बजरंग मंदिर की घंटियाँ जीवन में सात्विक ऊर्जा भरती थीं।
यहाँ का मोहर्रम और ताजिया उत्सव अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। ताज़ियों की वह नक्काशी और गम-ए-हुसैन में शरीक होने वाला पूरा गाँव,यह नज़ारा हिंदू-मुस्लिम एकता की एक ऐसी मिसाल था, जो आज के दौर में दुर्लभ है।
मेलों और त्योहारों का रंगीन संसार
गाँव का कैलेंडर त्योहारों और मेलों से तय होता था,
नर्मदा नदी  के घाट पर भूतड़ी अमावस का मेला श्रद्धा और रोमांच का वह संगम, जहाँ दूर-दूर से लोग आते थे।
*नाग पंचमी अखाड़ों की गूंज और मिट्टी की कुश्ती का वह जोश। भुजरिया तेवहार का रंगीन मौसम,
ईद, दिवाली और गणेश उत्सव,इन त्योहारों में पूरा गाँव एक घर बन जाता था। मिठाइयों का आदान-प्रदान और सामूहिक खुशियाँ ही बलड़ी की असली दौलत थीं। मिडिल स्कूल का टूर्नामेंट, कबड्डी खो खो, वालीबॉल,
कला और मनोरंजन की विरासत
उस दौर में मनोरंजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार थे।
रंगमंच,चाणक्य-माणक के नाटकों और  रामलीला का वह जीवंत अभिनय, जिसकी गूंज आज भी कानों में है। कठपुतली के खेल और रात-रात भर चलने वाली कव्वालियों,की महफ़िलें रूह को सुकून देती थीं।
आर्केस्ट्रा, गाँव में होने वाले आर्केस्ट्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अपना ही क्रेज था।
प्रशासनिक गरिमा,गाँव का रेंज ऑफ़िस जो अपनी व्यवस्था और हरियाली के लिए जाना जाता था, बलड़ी की एक अलग पहचान सुनिश्चित करता था।
करीम चचा का झूला और वह सुनहरी शामें
हमें याद है करीम चचा का वह झूला जहाँ बचपन की किलकारियाँ गूँजती थीं। शाम होते ही घरों के बाहर टंगे लालटेन की मद्धम रोशनी गाँव को एक अलौकिक सुंदरता देती थी। वह ‘सुनहरी शाम’ जब ढलती थी, तो ऐसा लगता था जैसे प्रकृति स्वयं हमें लोरी सुना रही हो।
आज भले ही बलड़ी की वह भौतिक धरती नर्मदा मैया की गोद में विश्राम कर रही है, लेकिन वह संस्कृति और वह परिवेश आज भी हम सबके भीतर जीवित है। हरसूद का वह हिस्सा जिसे हमने खोया, वह केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं था, वह एक पूरी सभ्यता थी। हमारे खेत, खलिहान, शिक्षक, पीर बाबा और बजरंग मंदिर ये सब हमारी रगों में दौड़ते संस्कारों के रूप में आज भी अमर हैं।
बलड़ी केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक ‘एहसास’ है, जो ताउम्र हमारे साथ रहेगा।

डॉ. मुश्ताक़अहमद शाह सहज़
हरदा मध्य प्रदेश

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