
1.) भारत में यदि किसान के स्थान पर अन्य कोई खेती-बाड़ी करते तो अनाज, सब्जी,दूध,फल आदि कयी गुना दाम पर मिलते।यह तो भारतीय किसान है जो खुद घाटे में रहकर भी देशवासियों का पेट भरने का काम कर रहा है। सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों,पूंजीपतियों और कोरपोरेट्स से मिलकर ऐसे हालात बनाने का प्रयास कर रही है ताकि किसान खेती-बाड़ी करना छोड़ दें तथा अपनी जमीनों को बेचने पर विवश हो जाये। ऐसे में करोड़ों किसान सस्ते मजदूर में उपलब्ध हो सकेगा तथा अनाज,फल , सब्जी,दूध आदि महंगे दामों पर मिलेंगे। बहुराष्ट्रीय कंपनियां, पूंजीपति और सरकार खुद बड़े -बड़े फार्म हाउस बनाकर खेती-बाड़ी करेंगे। तीन काले कृषि कानून भी इसीलिये लाये गये थे, लेकिन किसानों की जागरूकता ने इन कानूनों को लागू नहीं होने दिया। सरकार अब भी किसानों को परेशान करने के भरपूर प्रयास कर रही है ताकि किसान खेती-बाड़ी करना छोड़ दें। मंडियों में फसल बिक्री के दौरान इतने नियम बना दिये गये हैं कि किसान के लिये फसलों को बेचना युद्ध के समान हो गया है।ऊपर से हमारी सरकार अमरीका के दबाव में आकर उनके मक्का, सोयाबीन,कपास, सूरजमुखी आदि को भारतीय बाजारों में बिना किसी टैक्स के उतारने के लिये समझौता कर चुकी है। इससे भारतीय किसानों का मक्का, सोयाबीन,कपास, सूरजमुखी आदि भारतीय मंडियों में बिक नहीं पायेगा। अमरीका में बडे बडे फार्मों में खेती-बाड़ी की जाती है जबकि भारत में अधिकांश किसान दो तीन एकड़ जमीन वाले हैं।इस लूटपाट की व्यवस्था पर जो भी प्रश्न उठाता है, सरकार की नजरों में वही देशद्रोही कहलाता है।जो टोटे में रहकर भी देशवासियों का पेट भरता है,वह देशद्रोही है और जो विदेशी शक्तियों की गुलामी करके लूटपाट मचवा रहा है,वह राष्ट्रवादी कहलाता है। वास्तव में ही भारत सुरक्षित हाथों में नहीं है। कमजोर,कायर और लूटेरी अब्राहमिक शक्तियों का खूनी पंजा नाकारा भारतीय सिस्टम की मदद पाकर क्रूरता से भारतीय किसानों को रक्तरंजित कर रहा है।
2.) यदि प्रजा परस्पर लड़ना- झगड़ना शुरू कर दे तो कमजोर,विफल और वायदाखिलाफ राजा भी सुरक्षित हो जाता है। हालात फिलहाल कुछ ऐसे ही चल रहे हैं। ध्यान रहे कि प्रजा कभी खुद नहीं लडती है। प्रजा शांति और सद्भाव से रहना चाहती है।परस्पर छोटे -छोटे झगडे होते रहते हैं लेकिन वो समय के साथ सज्जनों के प्रयास से हल हो जाते हैं।राजा के सुरक्षित या असुरक्षित होने से इनका कोई संबंध नहीं होता है। जाति, मजहब,वाद, मत, पूजा-पाठ,पूजास्थल, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर झगड़े अधिकांशतः करवाये जाते हैं।वो प्रायोजित होते हैं।
3.) प्रतिभावान का राजनीति में कोई भविष्य नहीं है। प्रतिभावान व्यक्ति राजनीति में आकर अपना जीवन बर्बाद न करें। हालांकि हमारे नेताओं ने पिछले सात दशकों में दौरान भारत को बदहाल बना दिया है लेकिन फिर भी राजनीति में अपना भाग्य न आजमाकर किसी अन्य क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रयोग करें। और यदि फिर भी राजनीति में जाना चाहते हो तो सत्यनिष्ठा, करुणा,सेवा, राष्ट्रभक्ति आदि का त्याग कर दें तथा अपनी प्रतिभा का प्रयोग जनमानस को बेवकूफ बनाकर अपना घर भरने में लगायें। भारतीय राजनीति में इनका कोई स्थान नहीं है। भारतीय राजनीति पूरी तरह से लूटपाट, शोषण,धूर्तता, पाखंड, भ्रष्टाचार और अनाचार का पर्याय बन चुकी है।
4.) कृपया यहां मत थूकें, स्टेशन पर सफाई का ध्यान रखें, कूड़ा-कर्कट मत फैलायें,यात्री अपने सामान की खुद रखवाली करें,शाम को जल्दी सो जायें और सुबह जल्दी उठें, प्रतिदिन योगाभ्यास अवश्य करें,सदा सच बोलें, दूसरों पर अत्याचार मत करें, दूसरों के विचारों का सम्मान करें, लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार न करें- आदि आदि सैकड़ों प्रकार की शिक्षाएं हैं,जिनका एक पढे- लिखे व्यक्ति को पालन करना चाहिये। हमारी आज की शिक्षा- पद्धति यदि उपरोक्त जीवनमूल्यों को नहीं सिखला सकती,तो यह शिक्षा नहीं कहलानी चाहिये।ऐसी शिक्षा किसी काम की नहीं है। हमारी वर्तमान शिक्षा – प्रणाली हमारे युवाओं को न तो जीवन-मूल्य दे पा रही है,न रोजगार दे पा रही है,न चिकित्सा दे पा रही है,न सेवाभाव दे पा रही है,न परस्पर सम्मान करना सिखला पा रही है, न तार्किकता और वैचारिक स्वतन्त्रता दे पा रही है – तो ऐसी शिक्षा किसी काम की नहीं है।बंद करो इस ढकोसले को।
5.) पारसी,यहुदी, ईसाई, इस्लाम,सिख, बौद्ध मत,जैन मत, कन्फ्युशियस मत ,शिंतो आदि जितने भी मजहबों की पवित्र पुस्तकें हैं,वो या तो किसी ने लिखी हैं या फिर किसी पर प्रकट हुई हैं। ध्यान देने योग्य रहस्य यह है कि उपरोक्त सभी मजहबों की पुस्तकें पुरुषों ने लिखी हैं या पुरुषों पर प्रकट हुई हैं। किसी भी मजहब की कोई भी पवित्र पुस है तक नारी ने नहीं लिखी हैं तथा न ही नारी पर प्रकट हुई हैं।केवल मात्र सनातन धर्म के वेद ही ऐसी पवित्र पुस्तकें हैं जिनके मंत्रों के द्रष्टा ऋषियों के साथ के साथ ऋषिकाएं भी रही हैं।अपाला,घोषा ,यमी, इंद्राणी, लोपामुद्रा,विश्ववारा,वागांभृणी,सूर्या, जुहू,सार्पराज्ञी,रोमशा आदि तीस से अधिक ऋषिकाओं ने वेद मंत्रों का साक्षात् किया था। केवल मात्र सनातन धर्म के वेद ही ऐसी पवित्र पुस्तकें हैं जिनमें नर और नारी को परमज्ञान के साक्षात्कार का भरपूर अवसर प्रदान किया गया है। बाकी के सभी मजहबों की पवित्र पुस्तकें जरथुष्ट्र,मूसा,ईसा, मुहम्मद, गुरु नानक आदि, सिद्धार्थ गौतम, जैन महावीर , कन्फ्युशियस,कन्नूशी आदि रहे हैं।जेंद अवेस्ता,तोराह, बाईबल, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब,त्रिपिटक,जैनागम,लून यू ,कोजिकी आदि पवित्र पुस्तकें पुरुषों द्वारा लिखी गई हैं।नारी का कहीं कोई योगदान नहीं है।
6.) कहते हैं कि किसी काम को करने से पहले उसके संबंध में किसी से भी जिक्र कर देना विफलता के अवसरों में बढ़ोतरी कर देता है।जो भी करना है, चुपचाप करो। यहां -वहां पर अपने मित्रों, दोस्तों,पडोसियों,घर वालों, रिश्तेदारों और यहां तक कि अपने दुश्मनों से भी उस काम के संबंध में पहले ही बतला देना बने बनाये काम को बिगाड़कर रख देना है।अपनी पूरी शक्ति, ऊर्जा और एकाग्रता को अपने काम में लगाकर मेहनत करो। यदि सफल रहे तो दुनिया को आपके काम के बारे में अपने आप ही पता लग जायेगा।आपकी सफलता स्वयं ही अपना परिचय दे देगी।काम को करने से पहले उसके संबंध में डींगें मारना शक्ति, ऊर्जा और एकाग्रता को खंडित कर देता है। जीवन में सफल लोगों का यही जीवन- दर्शन होता है।इसका एक फायदा और भी है, यदि आप सफल नहीं हुये तो दुनिया को आपका मज़ाक उडाने का मौका नहीं मिलेगा। क्यों? क्योंकि उनको आपके काम के बारे में कुछ मालूम ही नहीं है।
7.) प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक शिक्षा -विभाग में अपनी पूरी कक्षाएं लेकर परीक्षा परिणाम के साथ -साथ विद्यार्थियों के आचरण में सुधार करने वाले किस शिक्षक को कोई पुरस्कार मिला है? किसी को भी नहीं। पुरस्कार आदि अपने काम को निष्ठा, मेहनत और अच्छी तरह से करने वाले को नहीं अपितु सिस्टम और अधिकारियों की चापलूसी करने वाले निठल्ले लोगों को मिलते हैं। पुरस्कार के सही पात्र तो फार्म भरने में हिचक और शर्म महसूस करते हैं। मैं स्वयं शिक्षा -विभाग में तीस वर्षों से हूं। मैंने तो आज तक किसी उचित पात्र को पुरस्कृत होते नहीं देखा है।जिन शिक्षकों को पुरस्कार मिलना होता है, उनसे पहले ही सैटिंग हो जाती है।एक हाथ दे और एक हाथ ले। किसी भी क्षेत्र के पुरस्कार वितरण में प्रतिभा, योग्यता और निष्पक्षता अपवादस्वरूप ही होते हैं। और इसके साथ यह भी है कि यदि किसी ने इस भ्रष्टाचार के विरोध में आवाज उठाई तो उसे ही कोई आरोप लगाकर या लगवाकर फंसा दिया जायेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा,बस परिवहन, रेलवे, हवाई परिवहन, खेती-बाड़ी, रोजगार,वन, बैंकिंग, पुलिस,राजनीति , मजहब आदि हरेक क्षेत्र में जमकर भ्रष्टाचार होता आया है तथा अब भी हो रहा है -लेकिन जिसने भी आवाज उठाई,उसी को जेल में भेज दिया गया। अभी पंचकूला वन -विभाग में दस हजार खैर के पेड़ों को रातों-रात काटकर बेच दिया।एक सुरक्षा कर्मी ने शिकायत कर दी। करोड़ों के पेड़ काटने वालों को न पकड़कर उसे सुरक्षाकर्मी को ही अनियमितता के अपराध में सस्पेंड कर दिया गया। सालों से नशे के खिलाफ मुहिम चलाने वाले एक पुलिसकर्मी को भी इसी तरह से टर्मिनेट कर दिया गया।अपराध करने वाला माफिया उच्च अधिकारियों और सरकार से मिला हुआ होता है।वह माफिया उच्च अधिकारियों और नेताओं को भी हिस्सा भेजता है। उच्च अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की किसकी हिम्मत है? इसीलिये सत्यनिष्ठ, निष्पक्ष और ईमानदार कर्मचारियों को ही फंसा दिया जाता है। ऐसे में भ्रष्टाचार नहीं बढ़ेगा तो और क्या बढ़ेगा? पुरुषार्थ, मेहनत, सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, करुणा, सेवा आदि की बातें सिर्फ कागजों और मंचों तक ही सीमित होती हैं। हकीकत में में तो भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चापलूसी, सैटिंग, जमाखोरी,मर्डर, बलात्कार ही सबसे अधिक सिस्टम प्रिय हैं।भ्रष्टाचार जब लंबे समय तक चलता है तो जनमानस भी इसे स्वीकार कर लेता है। जनमानस सोचने लगता है कि जब सभी भ्रष्टाचरण कर रहे हैं तो हम पीछे क्यों रहें? बड़े आदमी बड़े भ्रष्टाचार करते हैं तो छोटे व्यक्ति छोटे भ्रष्टाचार करते हैं। जिनके पास कोठियां,कारें,एसी, नौकरियां आदि मौजूद हैं,वो भी पीले कार्ड बनवाकर हर महीने पांच किलो अनाज,तेल आदि ले रहे हैं। भ्रष्ट सिस्टम में यह सब जायज है। आखिर छोटे लोग भ्रष्टाचार करने में क्यों पीछे रहें?शोध- आलेख,थिसिस, रिपोर्ट आदि तैयार करने तथा गोष्ठी, सैमिनार, व्याख्यान और कांफ्रेंस आदि के आयोजन में जमकर भ्रष्टाचरण होता है।जो भी इसके विरोध में आवाज उठायेगा, उसे ऐसी सजा दी जायेगी कि वह आजीवन आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करेगा।
8.) आखिर नेता, उच्च -अधिकारी, प्रशासन और जनसाधारण तर्क के सहयोग से किसी निर्णय तक पहुंचने की हिम्मत क्यों नहीं कर पा रहे हैं?किस बात का भय है इन्हें? भारत में हजारों वर्षों से दुनिया का सबसे पुरातन और सबसे बढ़िया तर्कशास्त्र मौजूद रहा है। लेकिन पिछली कुछ सदियों से भारतीयों ने तर्क से काम लेना लगभग त्याग दिया है। इसके फलस्वरूप धर्माचार्यों, मौलवियों, पादरियों, ग्रंथियों, भिक्षुओं, कथाकारों,नामदानी संतों, नेताओं, सुधारकों का धंधा बढ़िया चलने लगा है।इस धंधे में सफलता की गारंटी है और विफलता न के बराबर है। दुनिया पैरों में झुकेगी, प्रतिष्ठा मिलेगी, धन दौलत मिलेगी, महंगी गाड़ियां मिलेंगी, महलनुमा आवास मिलेंगे और निशुल्क विदेशी दौरे करने को मिलेंगे। उपरोक्त सारा घटिया खेल जीवन से तर्क के गायब होने के कारण हो रहा है। ऐसा नहीं है कि केवल जनमानस से ही तर्क को गायब कर दिया गया है, अपितु स्वयं दर्शनशास्त्र/फिलासफी/तर्कशास्त्र/ज्ञानशास्त्र के प्रोफेसर के जीवन में ही तर्क मौजूद नहीं है।इन विषयों के प्रोफेसर ही दो कोड़ी के अनपढ धर्मगुरुओं के पैरों में गिरे हुये देखे जा सकते हैं। अपने आपको शोधार्थी कहने वाले युवाओं के जीवन से ही तर्क, चिंतन, विचार, विमर्श, समीक्षा, आलोचना आदि से निर्णय पर पहुंचना गायब हो चुके हैं।
9.) अंधभक्ति, चापलूसी और मूढ़ता की पराकाष्ठा देखिये – अंधभक्त कार्यकर्ताओं के बच्चे जिन सरकारी विद्यालयों में पढ़ते हैं, जिन्होंने वो विद्यालय बंद किये हैं, अंधभक्त उन्हीं के झंडे उठाये घूम रहे हैं। इससे बड़ा पागलपन और क्या हो सकता है?जिन नेताओं ने सरकारी विद्यालयों को बंद किया है,उन नेताओं के बच्चे तो विदेशों में पढ रहे हैं। अंधभक्त कार्यकर्ताओं में सोच – विचार – तर्क करके निर्णय लेने की इतनी भी बुद्धि नहीं बची है कि वो अपने बच्चों के वर्तमान और भविष्य की दुर्गति को देख सकें। करते रहो लूटेरे नेताओं की जय -जयकार।जो नेता अपने अंधभक्त कार्यकर्ताओं को शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, पेयजल, सिंचाई जल, फसलों के भाव,रसोई गैस तक समय पर उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं, उन्हीं कार्यकर्ताओं के वोट लेकर लगातार सत्ता में जमे बैठे हैं। अंधभक्त बनाने की एक पूरी प्रयोगशाला होती है। एक सोची-समझी व्यूहरचना के अंतर्गत इसमें कार्यकर्ता की किसी समस्या के संबंध में मनन करने, तर्क करने, विचार करने, निर्णय लेने की शक्ति को समाप्त कर दिया जाता है।इस प्रकार से तैयार किया गया कार्यकर्ता खुद को, अपने परिवार को, अपने गांव को, अपने धर्म को, अपनी संस्कृति को, अपने राष्ट्र को, अपने रोजगार को, अपनी शिक्षा को, अपनी चिकित्सा को, अपने आवास को दांव पर लगाकर भी अपने लूटेरे नेताओं, धर्माचार्यों और सुधारकों की जय- जयकार करता रहता है। इससे यह सिद्ध होता है कि किसी राष्ट्र के लिये अंधभक्त नाम का प्राणी कोविड,कैंसर, टीबी,शूगर,दमा आदि से भी सैकड़ों गुना खतरनाक है। आजादी के पश्चात् से ही भारत इन अंधभक्तों का शिकार है। पिछले दो दशकों से तो अंधभक्तों की कयी फौज ही तैयार हो गई हैं। अंधभक्ति और अंधभक्तों से छूटकारा पाना का एकमात्र इलाज दर्शनशास्त्र नामक विषय के अंतर्गत ‘तर्क’ और ‘योगाभ्यास’ के पास है।इसीलिये हमारे नेताओं ने आज़ादी के पश्चात् सर्वप्रथम भारतीय शिक्षा- संस्थानों से दर्शनशास्त्र विषय को समाप्त करने की चालें चली हैं।जो विषय भारतीय नागरिकों में तार्किकता,वैचारिकता और बौद्धिकता को बढ़ावा देता हो,वह विषय लूटेरे नेताओं,शोषक धर्माचार्यों और नकली सुधारकों को कैसे पसंद आ सकता था? आजादी के पश्चात् होना तो यह चाहिये था कि भारतीय शिक्षा -संस्थानों में पूरी तत्परता से दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, योगशास्त्र ,विज्ञानशास्त्र,कृषिशास्त्र और तकनीकशास्त्र को बढ़ावा दिया जाता लेकिन हुआ इसका बिल्कुल विपरीत।इसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है – हमारे वायदाखिलाफ नकली नेता, निठल्ले धर्माचार्य, पाखंडी सुधारक और गिने- चुने स्वार्थी पूंजीपति।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119


