
इंतज़ार जो है वही तो नहीं होता,
कब तक करूँ इंतज़ार…
पर करनी पड़ती है इंतज़ार,
हर घड़ी, हर घड़ी, बस इंतज़ार।
जन्म से पहले माँ को बच्चे का इंतज़ार,
बड़ा हुआ तो उसके भविष्य का इंतज़ार।
बेटा पढ़-लिख कर काबिल बन गया,
तो फिर उसकी शादी का इंतज़ार।
खेतों की दरारों को अगली बारिश का इंतज़ार,
कि अबकी फसल में बरसेगा खुशियों का संसार।
विद्यार्थी की रातों को अच्छे नंबरों का इंतज़ार,
क़ब खुलेगा किसी बड़े कॉलेज का द्वार।
सियासत की कुर्सियों को नए वज़ीर का इंतज़ार,
अब कौन बनेगा प्रधानमंत्री, किसे मिलेगा अधिकार।
ग्लैमर की दुनिया में नए चेहरे की तलाश है,
किसकी फिल्म चमकेगी, किसे मिलेगा प्यार।
एक बाप की आँखों में उम्मीदों का इंतज़ार,
कि उसका बच्चा अगले साल ज़रूर होगा पास।
बूढ़े माँ-बाप को उन कदमों की आहट का इंतज़ार,
कि कब परदेस से लौटेंगे बच्चे घर इस बार।
माँ बैठी है कि बेटी दिल की बात कहेगी,
उसी एक अनकहे संवाद का इंतज़ार।
रोज़ अंधेरे को नए सूरज की रोशनी का इंतज़ार,
और तुलसी के पास दिया जलाने के उस संध्या का इंतज़ार।
पर सबसे कठिन, सबसे गहरा है वो सब्र,
होता है बेसब्री से उस फ़ौज़ी की पत्नी को इंतज़ार।
सरहद से सलामत वतन लौटने की आस में,
अपनी चौखट पर खड़े होकर, अपने सुहाग का इंतज़ार ।
कवयित्री ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार)




