
मेरी बेटी
जब बहुत छोटी थी
मेरे,पत्नी और भतीजे बाला जी के साथ
भैरहवा तक
यानी कि नेपाल बार्डर के आगे तक
यात्रा कर आयी थी;
दो-तीन साल की रही होगी
मैं, देवरिया पहुँचा तो
पूछने पर
उसकी माँ ने बताया
कि दादी के साथ गाँव गयी है,
अगले दिन गाँव पहुँचा
वहाँ देख रहा हूँ कि
गेहूँ के ढेर के पास
धूल धूसरित होकर
खेल रही है,
थोड़े रूखेपन से मैंने
अपनी माँ से बोला
खैर अब तो मेरी माँ भी नहीं हैं
की रूखापन दिखाऊँ या खुशी
पर माँ ने कहा कि
खुश होकर खेल रही है
इसीलिए वहां छोड़ दी हूँ,
समय गतिमान है
आगे टेलीविजन का जमाना आया,
तो बेटी, चित्रहार के हर गाने की धुन पर प्रतिक्रिया अपने चेहरे को
हल्की जुंबिश करा कर देती थी,
लंच और डिनर इस नाभिकीय परिवार के चारों सदस्यों में वह
सबसे बाद में आराम से खत्म करती थी,
खाने में समय लगाना और निवाले को चबा कर निगलना
सेहत के लिए भी लाभकारी है,
रायबरेली के शुरूआती दौर में ही छत पर खेलते हुए
उसकी हथेली करंट लगने से जल गयी थी,
वह समय भी हम दोनों के लिए सदमे का और
पीड़ादायक था,
द्वारिका,दिल्ली में रहते हुए
एक बार उसका मोबाइल फोन
से संपर्क नहीं मिलने पर
मेरी दशा पागलों जैसी हो गई,
वह किसी भी महत्वपूर्ण कार्य या लक्ष्य को पूरा करने हेतु सतत प्रयत्नशील रहती है,
उसकी कविताएँ अन्तर्मन से
प्रस्फुटित होती हैं,
किसी भी बाप का
सीना अठ्ठावन इंच का हो जायेगा
जब वह सुनेगा
रायबरेली के कवि मंडली से
की बेटी, पिता से अच्छा
लिखती है,
हुबहू यही बात उसकी शिक्षा
पर भी लागू होती है,
उसकी विदाई के समय
पापा की भावनाओं का हिमनद कर्तव्यों के कुहरे में ओझल था,
उस प्यारी बिटिया का जन्मदिन
मुझे दस दिन पहले से ही
याद आने लगता है,
बाप के अन्तर्मन का एक हिस्सा
या यूँ कहूँ की
बहुत बड़ा हिस्सा
बेटी के पास ही रहता है,
आखिरकार बेटियाँ ही तो
निर्मित करती हैं
मायके से ससुराल तक
घर-संसार
हर बहू तो
पहले बेटी होती है
जन्मदिन की
अनगिन बधाई,शुभकामनाएं और शुभाशीष
प्रिय मेरी वत्सला!
भावनाओं को शब्द दो,
सृजन को नये आयाम दो,
तुम्हारे घर-आंगन में हो
जीवन के हर परिक्षेत्र में
खुशियों का
उजाला ही उजाला।
रविशंकर शुक्ल
देवरिया /रायबरेली




