
मन के गहरे सागर में जब,
शांत लहरें सो जाती हैं।
इच्छाओं के कोलाहल में ,
सारी चेतनाएँ खो जाती हैं॥
तब कोई अंतर में बैठा,
मौन स्वयं को देख रहा।
जग के सारे रंगमंच पर,
जीवन-नाटक खेल रहा॥
न सुख उसमें उल्लास जगाता,
न दुःख उसे विचलित करता।
हर परिस्थितियों से जूझ कर
अपने दम पर आगे बढ़ता ॥
जो आया है, वह जाएगा,
यह जग क्षणभंगुर मेला है।
आत्मा तो अविनाशी ज्योति,
उसका न आदि, न अंत है॥
द्रष्टा बन जो स्वयं को जाने,
वही मुक्ति का द्वार पाए।
अंतर के प्यार की वाणी,
जीवन का संगीत सुनाए॥
न मंदिर में, न तीर्थों में,
न शब्दों के विस्तारों में।
वह मिलता है शुद्ध हृदय के,
निर्मल मौन विचारों में॥
“सुमन” कहे, अहंकार मिटाकर,
जब मन प्रेम में झुकता है।
जन्मों का अंधकार मिटे जाते,
तब आत्मा को सुकून मिलता है॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




