साहित्य

चम्बल की नियति

श्रीमती लक्ष्मी चौहान 'रोशनी'

ना गंगा बन पाई, ना यमुना बन पाई,
मुझे चम्बल बनना था, मैं चम्बल ही बन पाई।
पाप धोने थे मुझे सबके और ले जाना था मोक्ष की ओर,
मगर मैं पापिन ही बन पाई और बह गई किसी ओर।
ना गंगा बन पाई, ना यमुना बन पाई,
मुझे चम्बल बनना था, मैं चम्बल ही बन पाई।
गंगा के जैसी ही मुझको पवित्र बनना था।
सबकी छुवन से बचकर, मुझको चलना था।
पर डाकुओं से लुट कर, मैं अभिशप्त ही बन पाई।
मुझे चम्बल बनना था, मैं चम्बल ही बन पाई।
ना गंगा बन पाई, ना यमुना बन पाई,
मुझे चम्बल बनना था, मैं चम्बल ही बन पाई।
बीहड़ रास्ते मिले मुझको पर मुझको सीधा बहना था।
रक्त वर्ण से रंगी गई मैं, पर मुझको निर्मल रहना था।
कण कण में जीवन भरना था, पर जीवन ही हर पाई।
ना गंगा बन पाई, ना यमुना बन पाई,
मुझे चम्बल बनना था, मैं चम्बल ही बन पाई।
श्रीमती लक्ष्मी चौहान ‘रोशनी’
कोटद्वार, उत्तराखंड

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