
चुलबुली बिंदास और घर की लाडली,
चली आई दुल्हन बनकर वो ऐसे घर ।
जहां नारी की न इज्जत न विश्वास,
रूढ़िवादी जंजीरों में कैद हो गए पर।
दिन रात घुटती सपने सारे टूट गए,
कोई नहीं सुनता उसके मन की बात।
नौकरानी से बदतर हुआ जीवन उसका,
मायके ने भी नहीं दिया उसका साथ।
मारपीट गलियां दिन रात हुआ अपमान,
रो रो कर काट रही थी दिन और रात।
बच्चों को छोड़ कहीं जा नहीं सकती,
सोचती किसको सुनाए दिल की बात।
फिर एक दिन सुनी अंतर्मन की आवाज
तू काली तू दुर्गा तू ही नारायणी है।
उठ और बदल दे अपने जीवन को,
तू ही अपने जीवन की स्वामिनी है।
ना का मंत्र अपनाया उसने जीवन में,
अपने जीवन में बनाई कुछ सीमाएं।
मौन रहकर भी किया सबको परास्त,
पंख खोले मिल गई आजादी की हवाएं।
अडिग रही अपने किए फैसलों पर,
आत्मनिर्भरता को अपना आधार बनाया
रूढ़िवादी रीति रिवाज को तोड़कर,
अपने अनुसार अपना जीवन सजाया।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




