
कुछ लोग जीवन में आते हैं और अपनी उपस्थिति से ही हर चीज़ को विशेष बना देते हैं। वे केवल अपने परिवार या मित्रों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने कार्य, अपने स्वभाव और अपनी प्रतिभा से समाज पर भी एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऐसी ही एक आत्मा थी—अनमोल।
अनमोल केवल नाम नहीं था, वह वास्तव में अपने नाम के अनुरूप ही थी। कला उसके लिए शौक नहीं, बल्कि साधना थी। उसकी बनाई हुई हर पेंटिंग जैसे बोलती थी, हर रंग में उसकी भावनाएँ झलकती थीं। वह केवल चित्र नहीं बनाती थी, वह भावों को आकार देती थी। उसकी कला में एक जीवंतता थी, जो देखने वाले के मन को छू जाती थी।
जिले से लेकर राज्य स्तर तक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर प्रथम स्थान प्राप्त करना उसके समर्पण और प्रतिभा का प्रमाण है। वह उन कलाकारों में से थी, जो अपने हुनर से पहचान बनाते हैं और दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। आज भी कला से जुड़े लोग उसे याद करते हैं, क्योंकि उसकी कला में सच्चाई थी, आत्मा थी।
लेकिन अनमोल की सबसे बड़ी खूबी केवल उसकी कला नहीं थी, बल्कि उसका व्यवहार, उसकी सादगी और उसकी मुस्कान थी। वह हर किसी के दिल में अपनी जगह बना लेती थी। उसकी मुस्कान में अपनापन था, और उसकी बातों में स्नेह।
एक अधूरी इच्छा आज भी दिल में टीस बनकर रह जाती है—उसकी वह बात, जब उसने कहा था, “भाई, मेरे लिए कविता लिखना।” समय की भागदौड़ में वह कविता लिखी नहीं जा सकी, और फिर अचानक वह इस दुनिया से विदा हो गई। यह एक ऐसा खालीपन है, जिसे शब्दों में भरना आसान नहीं।
17 अप्रैल का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्मृतियों का एक गहरा सागर है। यह दिन उसकी यादों को और भी जीवंत कर देता है। वह भले ही इस संसार में नहीं है, लेकिन उसकी कला, उसकी मुस्कान और उसकी यादें हमेशा जीवित रहेंगी।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह जहाँ भी हो, शांति और सुख में हो। क्योंकि कुछ लोग दुनिया से जाते नहीं, वे बस स्मृतियों में बस जाते हैं—और अनमोल सच में जैसी थी वैसी ही उसकी अनमोल याद हैं।
✍️अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




