
जीवन खेल तमाशा देख
क्या होता है आगे देख!!
समय का चक्र यूंँ ही चलता है
बिछड़ जाते हैं नेक अनेक!!
इंसानों से भरी हुई है
दुनिया के हैं रंग अनेक!!
उनको भुला दो जीवन में
जो देते पीड़ा अनेक!!
जरूरत से रिश्ते बनते हैं
वर्ना तो है लोग अनेक!!
एक दिन तुम्हें भुला देंगे सब
अपनी करनी को तू देख!!
खोने को कुछ भी नहीं है
पाने को है को है झूठ फ़रेब!!
स्वार्थ से सारे बंधे हुए हैं
रिश्ते नाते रूप अनेक!!
अपनों का संसार नहीं है
कुछ दिन भुला के दुनिया देख!!
ख़ुशी बांँटने जब मैं निकला
ग़म के देखे रूप अनेक..!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान



