साहित्य

जे केहू पूछत

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

जे केहू पूछत नियरा के हमसे,बबुआ जिनगी में तू का देखलⵢ,
त हम ओकरा जतला देतीं,स्वारथ क भरल एक मेला देखलीं।
मतलब क हम मतलब क तूँ, मतलब क सगरों इहवाँ उहवाँ,
मतलब के बिना केहु के ना पइलीं,मतलब से भरल सगरो जहनवाँ।
गोरहर देखलीं,करिया देखलीं,पीयर नरखा बहुरूपिया देखलीं,
गटई में लटकत झलकत बबुआ, बहुरंगी कंठी माला के पइलीं।
काका काकी,भौजी देवर,भाई भतीजा सब रिश्ता में गइलीं,
रिश्ता क बंधन नाहीं पइलीं,निरखत जोखत पइसा के पइलीं।
जाके”अकिंचन”हर कोना ढुँढ़लीं,बकि प्रेमभाव कतहूँ ना पइलीं,
दिल के भीतर दिलवर ना पइलीं,स्वारथ क ही फूल खिलल देखलीं।
दिल देखलीं संत विरक्तन क,प्रभु भक्तन के हियमें जा झंकलीं,
जे जगती क दुख सगरो पियलस,ओके नीलकंठ के जइसन पइलीं।
स्नेह भरल दिय बतिया के देखलीं,परमारथ में देह जरावत पइलीं,
घर फूँक चलल जे कबिरा जइसन,सगरो जग के हम तारत देखलीं।
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” गोरखपुर
🔋चलभाष 9305988252

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