साहित्य

भगवान परशुराम

डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

दशावतार श्री हरि विष्णु के
परशुराम छठवें अवतार हैं,
भृगुकुल शिरोमणि जमदग्नि
व माता रेणुका की संतान हैं।

वामन अवतार बाद श्रीराम के
अवतार से पूर्व इनका जन्म है,
चिरजीवी अमर हैं, कलियुग के
अंत तक वे अभी भी विद्यमान हैं।

श्रीहरि विष्णु के परशुराम छठवें
अवतार एकमात्र ऐसे अवतार हैं,
जो आजतक के सभी अवतारों
के समय भी साक्षात विद्यमान हैं।

पिता जमदग्नि की आज्ञानुसार माँ रेणुका
का मस्तक काट, पिता को प्रसन्न किया,
कर्तव्य निष्ठा से प्रसन्न पिता ने वर दिया,
उन्होंने वर में माँ का जीवन मांग लिया।

(मातहिं पितहिं उरिन भये नीके।
गुरु ऋण रहा सोच बढ़ जीके॥)

कार्तवीर्य अर्जुन की हज़ार भुजाएं थीं,
इसलिए वह सहस्त्रबाहु कहलाता था,
लंकापति रावण को परास्त करने वाला,
तीनो लोकों में हाहाकार मचाया था।

परशुराम जब बाहर थे, कार्तवीर्य ने
उनके आश्रम पर हमला कर डाला था,
उनकी मुख्य गाय कामधेनु छीन ली थी,
परशुराम लौटे तो इसका पता चला था।

उन्होंने सहस्त्रबाहु की सभी भुजाएं
काटकर उसका वध कर डाला था,
सहस्त्रबाहु वध के प्रायश्चित हेतु
परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गए।

सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने ऋषि जमदग्नी
का वध कर डाला, तब इक्कीस बार
सहस्त्रबाहु के वंशजों का विनाश कर
पृथ्वी क्षत्रिय विहीन कर डाला था।

उनकी श्रीराम से राजा जनक के
दरबार में प्रथम बार जब भेंट हुई,
तब उन्हें यह बिलकुल ज्ञान नही था
कि श्रीराम विष्णु के ही स्वरूप हैं।

शिव धनुष तोड़ने के लिए क्रोध कर
जनक सभा में भगवान परशुराम और
श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के बीच
तीखा और कटु संवाद भी हुआ था।

डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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