
भीड़ में रहकर भी अकेला हूं,
यादों का दिल में एक मेला हूं।
खामोश कमरे की ये दीवारें,
जैसे थककर सोई हो मेरे सहारे।
खुद से ही बातें अक्सर करता हूं,
तन्हाई के साए में जीता मरता हूं।
कोई आहट नहीं कोई दस्तक नहीं,
अब तो खुद पर ही कोई हक नहीं।
चांद भी तनहा फ़लक पर रहता है,
शायद ये भी मेरी तरह कुछ कहता है।
सन्नाटो का शोर बड़ा गहरा है,
तन्हाई का हर तरफ एक पहरा है।
पंडित मुल्क राज “आकाश”




