

कभी कभी हमारे मन को कुछ ऐसी चोट लग जाती है कि
खामोशियाँ कितनी अज़ीज़ हो जाती हैं हमे,कि उनमें किसी की भी ,दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं होती।
बस खुद को महसूस करना,
खुद की बातों पर गौर करना,
खुद ही के साथ , कुछ पल बांटना अच्छा लगता है,हंस कर या फिर रोकर ही सही।
मन मे लगी उस चोट को याद करके मगर मन के भीतर उमड़ता सा,वो सैलाब शांत हो ही जाता है ना जाने क्यों ,खो सा जाता है मन।
खुद में कहीं,और वो जो घुटन होती है ,भीतर कहीं इकट्ठी हुई,
ऐसा लगता है ,जैसे धीरे धीरे कहीं गुम हो रही है,एक खालीपन सा ,जैसे रिक्त स्थान को भरने की कोई उम्मीद सी,
ना भाती हैं।
फिर बातें किसी की,ना किसी की तवज्जो अच्छी लगती हैं बस एक सफर थोड़ी देर का,खुद से खुद तक बस उस अहसास का जो मन को चोट खाई होती है
ख़ैर….।।
संगीता वर्मा ‘
कानपुर- उत्तर प्रदेश



