
भृगुवंशी तेज प्रखर जिनका, जिनका दिव्य उजास,
धर्मरक्षा हित उठा फरसा, अन्यायों का नाश।
जिनके मन में तप की गंगा, वाणी में सद्ज्ञान,
शौर्य, नीति, संयम, करुणा—सबका दिया विधान।
क्रोध नहीं, वह धर्म-ज्वाला थी, अधर्मों पर प्रहार,
सत्य-पथिक के रक्षक बनकर, किया जगत उद्धार।
ऋषि भी थे, रणधीर भी थे, अद्भुत जिनका रूप,
ज्ञान और पराक्रम मिलकर, जैसे प्रखर अनूप।
आओ उनके पावन जीवन से, हम यह सीखें आज,
बल हो लेकिन लोकहितैषी, नीति रहे सिरताज।
माता-पिता का मान बढ़ाएँ, गुरु चरणों का ध्यान,
सत्य, तपस्या, सेवा से ही, मिलता जग में मान।
परशुराम जयंती पर सब मिल, करें हृदय से गान,
धर्म, दया, सद्भाव जगाएँ, यही सच्चा सम्मान।
जय श्री परशुराम!
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




