
जीवन के तमस -पुंज और दुर्गम पथों में,
आदितीय ज्योति पुंज बनकर आए हो तुम।
संध्या बेला की मुखर खामोशियों में,
शाश्वत प्रकाश का संदेश बनकर आए हो तुम।
आत्म शून्य की निस्तब्ध मरुभूमि में,
प्राण प्रतिष्ठा की आभा बनकर आए हो तुम,
विलीन होते अस्तित्व की भयानक शून्यता में,
देवालय का पावन आवरण बनकर आए हो तुम।
संशय जाल की प्रचंड झंझावटो का भय नहीं,
चिरतन मिलन का आधार बनकर आए हो तुम।
धमनियों में संपदित चेतना की पिपासा हेतु,
आकाश अमरत्व का वरदान बनकर आए हो तुम।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




