
प्रातः काल जब हम उड़ते हैं। नई उम्मीद नई सोच नई ऊर्जा के साथ।
अपने खून पसीने से सींचते हैं।
जीवन की हर खुशियां।
प्रचंड धूप में जलते हैं।
प्रचंड ठंड में ठिठूरते हैं।
तेज बरसात में भीगते हैं।
खेतों में हल निरंतर चलते रहते हैं।
हर दुख दर्द सहते हैं चेहरे में मासूमियत नहीं आने देते हैं।
तूफानों लहरों से हम लड़ते हैं।
अपने कर्म के पीछे मुंह मोड़ के नहीं भागते हैं।
अपने हाथों की बाल से हर मुश्किलों का सामना करते हैं। हर कार्यों को हम बेखुबी से निभाते हैं।
हर कठिनाइयों का मुकाबला करते हैं। नकारात्मक सोच मन में नहीं आने देते हैं ।
आगे बढ़ते जाते हैं ।सफलता की चिंता नहीं करते हैं।
✍️✍️सुरेन्द्र कुमार बिन्दल कलमकार, साहित्यकार मॉडल टाउन जयपुर राजस्थान।




