साहित्य

लघुकथा- अक्षय मोती

डॉ ऋतु अग्रवाल

” माँ! मैं बर्बाद हो गई। सब खत्म हो गया माँ!” तीन दिन से अस्पताल में बेहोश पड़ी आरती को जब होश आया तो माँ-पापा को सामने देखकर वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
् “नहीं मेरे बच्चे! कुछ नहीं हुआ।” आरती की माँ मालती ने उसे अपने सीने से चिपका लिया।
” माँ! तुम मुझे अपना मोती कहती थीं न। देखो! उन दरिंदों ने तुम्हारे मोती को मलिन कर दिया।,” आरती के अस्फुट स्वर उसकी मन:स्थिति को बयां कर रहे थे।
“नहीं बिटिया! तू हमारा अक्षय मोती थी और रहेगी, हमेशा निर्मल और निष्कलंक।” कहकर आरती के पिता श्याम पुलिस स्टेशन की ओर चल दिए।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तरप्रदेश

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