
कितने ही डालियाँ सजी होंगी फूलों से,
कितने ही फूलों की डोली,
उठी होंगी भॅंवरों से…
कितने ही फूलों ने शाखी झूकाईं होंगी,
और कितने ही फूलों ने खुश्बू,
फिज़ाओं में महकाईं होंगी…
किसी के रंग – ए हुस्न गुलाबी रहे होंगे,
तो किसी पर लाल होने का फितूर रहा होगा,
जो खुबसूरत है, उसे संवरने की जरुरत नही,
ऎसा दा़ग हर फूल-फूल पर रहा होगा।
(संदीप कुमार,नई दिल्ली)



