
डॉ. संजय यादव

भारतीय ज्ञान परंपरा में नौ ग्रह की प्रतिस्थापना है। इनमें पृथ्वी भी एक ग्रह है। पृथ्वी ग्रह आज संकट में है। इस संकट में भी यह नित्य प्रति सूर्य की परिक्रमा में आलस्य नहीं रखती। पृथ्वी की गति ही आज के वैज्ञानिक काल गणना की आधार है। तुलसी भविष्य द्रष्टा थे। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि मध्यकाल में ही पृथ्वी संकट की आशंका देख रही थी- ‘अतिशय देखि धरम की ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त पृथ्वी और मानव के आत्मीय सम्बन्धों का काव्य प्रमाण है। पृथ्वी सूक्त (12.1) में ‘माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्या’ का सन्देश है। इसका आशय है कि “भूमि मेरी माता है, और मैं इसका का पुत्र हूँ।” यह भूमि सूक्त का प्रसिद्ध मन्त्र है। यह वाक्य मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे नैतिक, पर्यावरणीय संबंधों की सहज अभिव्यक्ति है। इसका गूढ़ निहितार्थ है कि जिस प्रकार एक पुत्र अपनी माता की सुरक्षा, सेवा और सम्मान करता है, उसी प्रकार मनुष्य का कर्तव्य है कि वह पृथ्वी की सुरक्षा करे और उसके संसाधनों का संतुलित तथा सतत उपयोग सुनिश्चित करे। मानव और पृथ्वी का यह सम्बन्ध राष्ट्रभाव का स्रजक भी है।
अब तक के ज्ञात इतिहास में पृथ्वी समस्त जीवों का एकमात्र निवास स्थान है, जहाँ जीवन के लिए आवश्यक सभी तत्व और जैव विविधता उपलब्ध हैं (अब मंगल ग्रह की कवायद भी शुरू है)। वैदिक दृष्टिकोण में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है। भारतीय आर्ष परम्परा का यह संदेश ‘पर्यावरणीय नैतिकता’ का मूल आधार है। जिस प्रकार शरीर में वात, कफ और पित के संतुलन से शरीर स्वस्थ्य रहती है, उसी प्रकार पञ्च महाभूतों के संतुलन से प्रकृति का संतुलन बना रहता है।
किन्तु आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में यह संतुलन विनाशक गति से बिगड़ रहा है। जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, तकनीकी विकास और उपभोक्तावादी जीवनशैली के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। वैश्विक स्तर पर निर्वनीकरण, जैव विविधता का ह्रास, जल और वायु प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन गंभीर समस्याओं के रूप में उभर रहे हैं। विशेष रूप से कार्बन उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग के रूप में देखा जा रहा है। इससे हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, और प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा और तूफान की तीव्रता बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के एक रिपोर्ट (2024) के अनुसार विश्व में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता देशों के अनुसार व्यापक रूपसे भिन्न है। इथोपिया में लगभग 55–60 प्रतिशत लोग सुरक्षित जल से वंचित हैं, जबकि नैजीरिया में यह आँकड़ा 30–35 प्रतिशत है। भारत में लगभग 10–15 प्रतिशत तथा बंगलादेश में 8–10 प्रतिशत लोग स्वच्छ जल से वंचित हैं।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी एवं ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के एक रिपोर्ट (2024) के अनुसार विश्व में कार्बन उत्सर्जन का वितरण अत्यंत असमान है, जो देशों के औद्योगिक विकास, ऊर्जा स्रोतों और जनसंख्या पर निर्भर करता है। चीन लगभग 30-35 प्रतिशत वैश्विक कार्बन डाइ आक्साइड उत्सर्जन के साथ प्रथम स्थान पर है, जबकि अमेरिका करीब 12-14 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है। भारत लगभग 7 प्रतिशत, रूस लगभग 5 प्रतिशत तथा जापान करीब 3 प्रतिशत योगदान देते हैं। यह असंतुलन वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौती को और जटिल बनाता है।
विश्व स्तर पर इन समस्याओं से निपटने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। स्टॉकहोम सम्मेलन (1972) संयुक्त राष्ट्र का पहला बड़ा पर्यावरण सम्मेलन था। इसमें पहली बार वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार किया गया और यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) की स्थापना हुई। रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन (1992) में सतत विकास की अवधारणा को प्रमुखता मिली। इसमें जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता से संबंधित महत्वपूर्ण समझौते हुए। क्योटो प्रोटोकॉल (1997) समझौते का उद्देश्य विकसित देशों द्वारा ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करना था। यह जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन (2002) में सतत विकास को लागू करने के लिए व्यावहारिक योजनाओं पर जोर दिया गया। गरीबी उन्मूलन और पर्यावरण संरक्षण को साथ जोड़ने की बात की गयी।
पेरिस जलवायु समझौता (2015) का लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2° सेटीग्रेड से नीचे रखना और संभव हो तो 1.5° सेटीग्रेड तक सीमित करना है। यह आज का सबसे महत्वपूर्ण जलवायु समझौता माना जाता है। ग्लासगो जलवायु सम्मेलन (कॉप-26, 2021) में देशों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने और नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में कदम बढ़ाने पर चर्चा की। इन सभी सम्मेलनों से यह स्पष्ट है कि पर्यावरण संरक्षण अब केवल एक देश की नहीं अपितु पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता के संकट को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
आज जो भी वैश्विक समझौते हो रहें हैं उनका उद्देश्य भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले अपने मन्त्रों में गाया है। उन्हें यह विदित था कि पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों से नहीं होगा, अपितु यह प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बनना चाहिए। इसीलिए उन्होंने “माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः” नैतिकबोध जैसे मन्त्र का गान किया। भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की परंपरा है, जो आज के वैश्विक संदर्भ में एक आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करती है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के प्रगाढ़ भाव आज भी जनजातीय समाज में देखें जा सकते हैं। आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करे।
आज पृथ्वी संकटग्रस्त है। जल प्रदूषित है। वायु विषाक्त है। प्रकृति में मधुआपूरित वातायन घटते जा रहे हैं। हिमनद पिघल रहे हैं। नदी संस्कृति के राष्ट्र में नदियां सुख गयीं हैं। जन-मन की निर्भरता बोतल बंद पानी पर बढ़ रही है। वर्ष 2000 में संपन्न पेरिस अर्थ चार्टर में दुनिया के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी संरक्षण के बाईस सूत्र बताये, लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है सर्वविदित है। प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाल पृथ्वी दिवस अंतरराष्ट्रीय कर्मकांड हो गया है। जब हममें यह होगा कि हम पृथ्वी के स्वामी नहीं, संरक्षक हैं, तभी हम एक सुरक्षित, संतुलित और सतत भविष्य की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा की शरणागति ही इसका विकल्प है।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)



