
भारतीय समाज की आत्मा रिश्तों की बहुलता में निहित रही है। चाचा, ताऊ, मासी, बुआ, फूफा, मौसा, नाना–नानी, दादा–दादी—ये केवल पारिवारिक संबोधन नहीं थे, बल्कि जीवन के प्रत्येक चरण में मार्गदर्शन, संरक्षण और संस्कार देने वाले जीवंत स्तम्भ थे। संयुक्त परिवार की परंपरा ने व्यक्ति को कभी अकेला नहीं होने दिया। यह व्यवस्था केवल साथ रहने की नहीं, बल्कि साथ जीने और साथ सँवरने की संस्कृति थी।
किन्तु आधुनिक काल में “हम दो, हमारे दो” की अवधारणा ने परिवार को सीमित इकाई में परिवर्तित कर दिया। परिणामस्वरूप रिश्तों का वह विशाल वृक्ष, जिसकी छाया में कई पीढ़ियाँ सुरक्षित और संस्कारित होती थीं, धीरे-धीरे सिमटता चला गया। आज अनेक घरों में चाचा–ताऊ, बुआ–मासी केवल स्मृतियों या औपचारिक संबंधों तक सीमित रह गये हैं।
शास्त्रीय दृष्टि से संयुक्त परिवार भारतीय गृहस्थ धर्म का मूल आधार था। मनुस्मृति, गृह्यसूत्रों और धर्मशास्त्रों में परिवार को संस्कार-परंपरा की प्रथम पाठशाला माना गया है। चाचा–ताऊ अनुशासन, मर्यादा और पुरुषार्थ का बोध कराते थे, वहीं बुआ–मासी वात्सल्य, करुणा और सामाजिक संतुलन का संस्कार देती थीं। विविध व्यक्तित्वों के मध्य जीवन जीते हुये बालक स्वाभाविक रूप से सहनशीलता, समायोजन और सामूहिकता सीखता था।
वर्तमान एकाकी परिवार-प्रणाली में यह प्राकृतिक प्रशिक्षण क्षीण होता जा रहा है। बच्चा सुविधाओं के मध्य तो पल रहा है, पर संबंधों की विविधता से वंचित है। परिणामस्वरूप उसका भावनात्मक संसार सीमित हो रहा है। वह अपेक्षाओं का केंद्र तो बनता है, पर जीवन के विविध दृष्टिकोणों से अपरिचित रह जाता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी संयुक्त परिवार का विघटन गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। पहले दुख साझा होता था, तनाव बँट जाता था और समाधान सामूहिक विवेक से निकलता था। आज समस्यायें व्यक्ति के भीतर ही दब जाती हैं। इसी कारण अवसाद, अकेलापन, चिड़चिड़ापन और संबंध-विच्छेद जैसी स्थितियाँ बढ़ती दिखाई देती हैं। रिश्तों का अभाव भावनात्मक रिक्तता को जन्म देता है, जिसे भौतिक साधन कभी पूर्ण नहीं कर सकते।
यह सत्य है कि शहरीकरण, रोजगार की अनिश्चितता और आधुनिक जीवनशैली ने संयुक्त परिवार की संरचना को चुनौती दी है। परंतु चुनौती का समाधान परंपरा-त्याग नहीं है। आवश्यकता है चेतन रूप से रिश्तों को जीवित रखने की। भौगोलिक दूरी के बावजूद भावनात्मक निकटता संभव है—यदि संवाद, सहभागिता और पारिवारिक संस्कारों को प्राथमिकता दी जाए।
समाधान “छोटा परिवार” बनाम “बड़ा परिवार” की बहस में नहीं, बल्कि रिश्तों की चेतना में निहित है। छोटा परिवार भी संबंधों की दृष्टि से बड़ा हो सकता है, यदि बच्चों को चाचा–ताऊ, बुआ–मासी से जोड़कर रखा जाये, पर्व–त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों को संस्कार-परंपरा के रूप में जिया जाये।
संयुक्त परिवार का क्षरण मात्र सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतावनी है। रिश्तों की बहुलता भारतीय जीवन-दर्शन की आत्मा रही है। यदि हम इसे खो देंगे, तो समाज भावनात्मक रूप से निर्धन हो जायेगा। समय की माँग है कि आधुनिकता के साथ चलते हुए भी हम रिश्तों की विरासत को सँजोये रखें—क्योंकि सुदृढ़ परिवार ही सशक्त समाज और सुदृढ़ राष्ट्र की आधारशिला हैं।
ज्योतिषाचार्य अरुण कुमार मिश्र
(ज्योतिर्विद, लेखक, कवि,सनातन धर्म एवं संस्कृति प्रेरक-वक्ता व
राष्ट्रीय अध्यक्ष – माँ शारदा वेलफेयर सोसाइटी)
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